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Haryana

जहां भागवत कथा होती है, वहां नकारात्मकता समाप्त हो जाती है: दीपक वशिष्ट

सत्यखबर,सफीदों ( सत्यदेव शर्मा   ) वेदाचार्य दंडीस्वामी निगमबोध तीर्थ महाराज के पावन सानिध्य में नगर के ऐतिहासिक नागक्षेत्र मंदिर प्रांगण में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ में मंगलवार को सफीदों के एसडीएम विरेंद्र सांगवान ने बतौर अतिथि शिरकत की। वहीं व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को कथावाचक दीपक वशिष्ट श्रद्धालुओं को श्रीमद् भागवत कथा का रसपान […]

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सत्यखबर,सफीदों ( सत्यदेव शर्मा   )

वेदाचार्य दंडीस्वामी निगमबोध तीर्थ महाराज के पावन सानिध्य में नगर के ऐतिहासिक नागक्षेत्र मंदिर प्रांगण में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ में मंगलवार को सफीदों के एसडीएम विरेंद्र सांगवान ने बतौर अतिथि शिरकत की। वहीं व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को कथावाचक दीपक वशिष्ट श्रद्धालुओं को श्रीमद् भागवत कथा का रसपान करवाया। कथा के आयोजक पदाधिकारियों ने एसडीएम विरेंद्र सांगवान का अभिनंदन किया और एसडीएम ने कथा में मंचासीन दंडीस्वामी निगमबोध तीर्थ महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया। अपने संबोधन में एसडीएम विरेंद्र सांगवान ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने और सुनने से असीम शांति का अनुभव होता है। भागवत कथा के श्रवण से भगवान के प्रति अनुराग उत्पन्न होता है। आज की भागमभाग की जिंदगी में चारों ओर अशांति है और रिश्ते-नाते व भाईचारा खत्म होता जा रहा है, जोकि समाज के लिए सोचनीय विषय है। अगर सही रूप से भागवत का जीवन में उतार लिया जाए तो सभी विद्वेष अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे। व्यास पीठ से कथावाचक दीपक वशिष्ट ने कहा कि भागवत के माध्यम से सांसारिक मोह-माया के बंधन से छूटकर जीवन की सत्यता को जाना जा सकता है। श्रीमद्भागवत कथा हमें मोह-माया के बंधन से मुक्त कराती है और बोध कराती है कि किस उद्देश्य के लिए हमारा जन्म हुआ है। जिस भी क्षेत्र में भागवत कथा होती है वहां का वातावरण सकारात्मक रहता है और नकारात्मकता नहीं रहती। भागवत साक्षात भगवान का स्वरूप है, इसीलिए श्रद्धापूर्वक इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। इसके पठन एवं श्रवण से भोग और मोक्ष दोनों सुलभ हो जाते हैं। मन की शुद्धि के लिए इससे बड़ा कोई साधन नहीं है। सिंह की गर्जना सुनकर जैसे भेडि़ए भाग जाते हैं, वैसे ही भागवत के पाठ से कलियुग के समस्त दोष नष्ट हो जाते हैं। इसके श्रवण मात्र से हरि हृदय में आ विराजते हैं। भागवत में कहा गया है कि बहुत से शास्त्र सुनने से क्या लाभ हैं? इससे तो व्यर्थ का भ्रम बढ़ता है। भोग और मुक्ति के लिए तो एकमात्र भागवत शास्त्र ही पर्याप्त है। हजारों अश्वमेध और वाजपेय यज्ञ इस कथा का अंशमात्र भी नहीं हैं। फल की दृष्टि से भागवत की समानता गंगा, गया, काशी, पुष्कर या प्रयाग कोई भी तीर्थ नहीं कर सकता।