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Haryana

43 एकड़ जमीन की पराली न जलाकर हैपी सीडर से बिजाई कर बलराज नैन बने प्ररेणास्त्रोत

सत्यखबर, नरवाना, (सन्दीप श्योरान):– पराली नहीं जलायेंगे, पर्यावरण को बचायेंगे, की मुहिम धीरे-धीरे किसानों को समझ में आ रही है। जिसके लिए वे प्रशासन का सहयोग करने मेें आगे आ रहे हैं। ऐसे ही गांव कालवन के एक किसान हैं बलराज नैन पुत्र हवासिंह। किसान बलराज नैन को जागरूक किसान की संज्ञा दी जाये, तो […]

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सत्यखबर, नरवाना, (सन्दीप श्योरान):– पराली नहीं जलायेंगे, पर्यावरण को बचायेंगे, की मुहिम धीरे-धीरे किसानों को समझ में आ रही है। जिसके लिए वे प्रशासन का सहयोग करने मेें आगे आ रहे हैं। ऐसे ही गांव कालवन के एक किसान हैं बलराज नैन पुत्र हवासिंह। किसान बलराज नैन को जागरूक किसान की संज्ञा दी जाये, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। बलराज नैन के पास 43 एकड़ जमीन हैं, जिन्होंने अपने खेतों में धान की फसल उगाई थी, धान की फसल काटने के बाद उन्होंने पराली नहीं जलाई, बल्कि उन्होंने कटर से धान के अवशेषों को जमीन में मिला दिया और उसके बाद कंबाइन हैपी सीडर से 43 एकड़ में गेहूं की बिजाई कर दी।
बलराज नैन ने बताया कि उसको यह प्रेरणा कृषि विभाग द्वारा समय-समय पर दी गई योजनाओं से मिली हैं। उन्होंने बताया कि पहले एक एकड़ में गेहूं की बिजाई करने से 3 हजार रूपये खर्चा आता था, लेकिन अब कंबाइन हैपी सीडर से केवल 1 हजार रूपये में काम चल गया। उन्होंने बताया कि कंबाइन हैपी सीडर से बिजाई करने से फायदा यह होगा कि जमीन में मंडूसी पैदा नहीं होगी, अवशेष खाद का काम करेंगे। इसके साथ ही हैपी सीडर से अगेती बिजाई हो गई। उन्होंने बताया कि धान के अवशेष न जलाने पर जमीन में नमी बनी रहेगी, जिससे 2 कट्टे यूरिया कम पड़ेगी। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि गेहूंं की फसल पकते समय गिरेगी नहीं।
पर्यावरण बचाने के लिए किसान न जलाये पराली
किसान बलराज नैन ने अन्य किसानों से अपील करते हुए कहा कि किसानों को अपना फायदा छोड़कर पराली को न जलायें, ताकि पर्यावरण मे बढ़ते प्रदूषण को रोका जा सके। कंबाइन हैपी सीडर से बिजाई करने से किसानों को फायदा ही होगा, जो भविष्य में दिखाई देगा। किसानों को प्रशासन का साथ देने के लिए आगे आना चाहिए, ताकि बुजुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े।  गांव कालवन के किसान बलराज नैन द्वारा 43 एकड़ जमीन में पराली न जलाकर हैपी सीडर से बिजाई करने से अन्य किसानों के प्रेरणास्त्रोत बन गये हैं। उनके इस साहसिक कदम से दूसरे किसानों ने भी धीरे-धीरे पराली न जलाने की कसम ली है।
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