Connect with us

Mahendergarh

राव की बेटी के नांगल चौधरी में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद राव समर्थकों में क्यों छाई मायूसी?

Published

on

सत्यखबर, महेंद्रगढ़

26 फरवरी से पहले कई सप्ताह तक महेंद्रगढ़ जिले समेत समस्त अहिरवाल में राव की बेटी का नांगल चौधरी का कार्यकर्ता सम्मेलन पूरे राजनीतिक वातावरण को गर्माए हुए था। परंतु जनसभा के बाद छाई खामोशी पर लोग अचंभित हैं। इस खामोशी के साथ राव समर्थकों की मनोदशा के भी मतलब निकाले जाने लगे हैं। वास्तव में जिस जोश खरोश के साथ रैली का प्रचार किया गया था और जिस तरह से इस रैली के 1 दिन पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में 25 से 30 हजार लोगों के पहुंचने की उम्मीद जताई गई थी और जिस तरीके से राव को आश्वस्त किया गया था कि उनकी बेटी की विरासत की ताजपोशी अभूतपूर्व तरीके से की जाएगी उन सभी बातों पर इस जनसभा की वास्तविकता भारी पड़ती नजर आई । जहां 16 सौ कुर्सियाँयों के पंडाल में भी स्कूल की लड़कियों को बैठाना पड़े तो यह वास्तव में ही चिंता का विषय है।

*8 जीबी रैम और 5000mAh बैटरी के साथ Vivo का नया 5G फोन लॉन्च, चेक करें कीमत और स्पेसिफिकेशन्स*

 

रैली के बाद में पत्रकारों का आकलन जब ढाई हजार की संख्या के आस पास घूमने लगा तो राव कैंप के हौसले आसमान से धरती पर आकर टिक गए। आनन-फानन में अखबारों की रिपोर्ट को बदलवा कर बेटी को ‘अहीरवाल की राव’ बनाने का प्रबंध किया गया। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि कोई भी अखबार भीड़ के आकलन की संख्या ना लिखें। यह तो त्वरित कार्यवाही थी जो हो गई। परंतु कार्यकर्ताओं की चिंता तो यह है कि जब राजा दरबार में इन सब पर जवाब तलबी करेंगे तब वह क्या कहेंगे। 2019 के नांगल चौधरी हल्के के चुनाव परिणाम के बाद इसी तरह की स्थिति का सामना यह बेचारे कर चुके हैं तो पिछला अनुभव इन्हें चिंतित कर रहा है।

 

इस जनसभा के बाद दूसरा चर्चित विषय आरती राव का भाषण बना हुआ है। आरती ने अपना भाषण नांगल चौधरी विधानसभा में हुए विकास कार्यों एवं यहां के विधायक पर ही केंद्रित रखा। राव परिवार का कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से झूठ बोले यह बात लोगों की समझ से परे है। आरती ने जिस तरीके से क्षेत्र में हुए विकास के सभी कामों का श्रेय अपने पिताश्री को दिया उससे लोग दांतो तले उंगली दबा रहे हैं। मेडिकल कॉलेज का श्रेय देते हुए उन्होंने अपने मंत्री से भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि स्वयं मुख्यमंत्री हरियाणा ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मंत्री जी समेत तत्कालीन चारों विधायकों को साथ बैठा कर इसका निर्णय किया था। इस निर्णय के मुख्यमंत्री समेत चार साक्षात गवाह अभी जिंदा हैं।

*NEET MDS 2022: नीट एमडीएस परीक्षा टली, अब मई में इस तारीख को होगा एग्जाम*

 

इसी तरह लॉजिस्टिक हब पर दावा करने से पहले आरती ने अपने पिताश्री से यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि नारनौल में स्थानांतरित होने के फैसले के कई महीनों बाद भी उन्होंने अपने मंत्री के साथ बावल के किसानों का प्रतिनिधि मंडल मुख्यमंत्री से यह कहने हरियाणा भवन में भेजा था कि सरकार जिस भाव में कहेगी उसी भाव में जमीन देने के लिए तैयार हैं परंतु तब तक गंगा जी में बहुत पानी बह चुका था।

 

इसी तरह नेशनल हाईवे पर दावा करते समय वह इस बात को भी भूल गई कि उनके पिताश्री की हाजिरी में एनएच 152डी के शिलान्यास के ऑनलाइन समारोह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री गडकरी जी ने इसे सभी की हाजिरी में हरियाणा के “धरतीपुत्र” तत्कालीन भूतल परिवहन सचिव हरियाणा काडर के आईएएस अधिकारी युद्धवीर सिंह मलिक की कल्पना बताया था। मलिक साहब के पास कौन गया था यह सारे इलाके को पता है। पानी के जिन पत्रोँ की बात आरती कह कर गई है वह भी राजनीतिक लिफाफेबाजी थी। पानी के लिए धरती पर किसने काम किया है यह भी सारा क्षेत्र जानता है। झूठ परोसने से पहले उनको अपने पिता श्री से पहले इन सारे मामलों पर सलाह कर लेनी चाहिए थी।

 

वास्तव में इन लोगों की दिक्कत यह है कि इन्होंने इलाके की चौधर के नाम पर बिना किसी उपलब्धि के कई दशकों तक लोगों के वोट से राज किया। परंतु 2014 के बाद में मुख्यमंत्री ने ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा दिया और भारतीय जनता पार्टी ने इस इलाके में जब काम करवाया तो स्वाभाविक रूप से कुछ चेहरे चर्चा में आ गए। अब इनकी दिक्कत यह है कि इन्हें अपना सिंहासन हिलता हुआ नजर आ रहा है और यही इस सब बवाल की जड़ है। यह लोग इस अजीब जिद्द के शिकार हैं कि ‘राज भी हम करेंगे और काम भी नहीं करेंगे’। यह जनसभा भी उसी घबराहट का एक नतीजा थी। परंतु विरासत का समारोह करने से पहले धरती पर आकलन कर लेना चाहिए था।

 

इससे जुड़ा हुआ तीसरा चर्चित विषय है आरती राव द्वारा नांगल चौधरी के विधायक डॉ अभय सिंह यादव का नाम लिए बगैर उन पर लगभग सीधा निशाना बनाना। डाँ यादव सरकारी नौकरी छोड़कर विधायक बने और उन्होंने उसके उपरांत भी अपनी कार्यशैली में सरकारी कर्मचारी की तरह काम करने की आदत को बनाए रखा। राजनीतिक दांवपेच खेलने की अपेक्षा वह दिन रात विकास के कामों में आगे बढ़ते रहे और मुख्यमंत्री का आशीर्वाद उन पर बना रहा। इसी वजह से इलाके में एक कै बाद दूसरा काम होता चला गया। उनकी इस शैली ने उनको एक चर्चित चेहरा बना दिया और यही राव की नाराजगी का कारण बन गई।

 

जब आरती राव ने यह कहा कि आखिर एक व्यक्ति इतने कामों का श्रेय कैसे ले सकता है तो वह यह भूल गई कि वह तो विधायक की आलोचना की बजाए उसकी प्रशंसा कर गई। क्योंकि वास्तविकता यह है कि जनता से इन सभी कामों के लिए डॉ अभय सिंह स्वीकार्यता प्राप्त कर चुके हैं। “पीठ में छुरा घौंपने” एवं “मुख्यमंत्री की गोद” वाली बात भी जनता के गले नहीं उतरी क्योंकि मुख्यमंत्री से मिलकर क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाना किसी की पीठ में छुरा नहीं बल्कि इलाके की पीठ मजबूत करने का काम है। लोग इसीलिए डॉ यादव को पसंद करने लगे हैं चाहे राव साहब को यह बात अच्छी लगे या नहीं। परन्तु यही वास्तविकता है।

 

चौथा चर्चित विषय आरती के भाषण में लगभग सीधे-सीधे पार्टी, सरकार और मुख्यमंत्री पर निशान है। किसान आंदोलन में किसानों के साथ हमदर्दी जताते हुए जिस तरीके से मुख्यमंत्री समेत पार्टी के नेताओं द्वारा नारनौल में की गई जनसभा पर व्यंग और 2014 के बहुमत का सारा श्रेय अपने पिताश्री को देना और खुद चुनाव लड़ने की घोषणा करना यह सारी बातें पार्टी को औकात बताने वाली हैं। यह पहली बार भी नहीं है, इनके पिताश्री भी लगभग समय-समय पर इसी तरह की भाषा बोलते रहते हैं। परंतु भारतीय जनता पार्टी पर राव का दबाव ठीक वैसा ही है जैसे कांग्रेस की सरकार पर पाकिस्तान के एटम बम का था। पाकिस्तान जब भी शरारत करता था तो एटम बम का डर दिखाता था। इसी तरह राव भी जब भी पार्टी उसकी इच्छाओं को पार करने की कोशिश करती है तो पार्टी छोड़ने की धमकी देते हैं। परंतु पार्टी को थोड़ा सा पीछे इतिहास में झांकने की जरूरत है। जबअमर शहीद राव तुलाराम, जिनकी शहादत पर समस्त अहीर समाज नाज करता है और जिनके नाम पर इनकी पीढियों ने राज किया है उनके जन्मदिन की छुट्टी इनकी उपस्थिति में रद्द करते हुए उनके बारे में अभद्र शब्द के प्रयोग को सुनकर भी जो व्यक्ति कैबिनेट से बाहर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया वह आदमी कभी सत्ता को छोड़कर चला जाएगा इसकी तो कल्पना भी करने की जरूरत नहीं है। हां, एक बात अवश्य है कि जिस दिन इन्हें यह पता लग जाएगा कि सत्ता जा रही है तो उस दिन यह किसी बंधन से भी रुकने वाले नहीं हैं। दरअसल सत्ताजीवी केवल सत्ता में रहना पसंद करते हैं इस विषय में ज्यादा चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। राव की राजनीतिक ताकत उनकी लगातार सत्ता में रहकर ही सुरक्षित है। क्योंकि वह दबदबे की राजनीति करते हैं और इस दबदबे की वजह से हर राजनीतिक फैसले में उनकी भूमिका होती है। इसी भूमिका की वजह से अहीरवाल के हर हल्के में कई कई कार्यकर्ता टिकट के लिए उनकी परिक्रमा करते रहते हैं। यही उनके लिए भीड़ जुटाते हैं, यही उनके लिए चंदा एकत्रित करते हैं और यही उनको हरियाणा की “आन बान शान’ एवं “बब्बर शेर” कहते हैं। अतः किसी भी हालत में राव कभी सत्ता से समझौता नहीं करेंगे।

 

राव की हर जनसभा के पीछे कोई कारण और उद्येश्य होता है। जब जब भी उनके हाथ से सत्ता ढीली होने का उन्हें एहसास होता है तभी वह किसी न किसी जगह भीड़ को इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं ताकि पार्टी पर उनका अंकुश बना रहे। यही उनकी शक्ति बन गई।

परंतु इस सब के बावजूद भी अब अकर्मण्यता राव की कमजोरी बन कर उभर रही है। उनके पास उपलब्धियों के नाम पर विशेषकर महेंद्रगढ़ जिले में गिनाने के लिए कुछ भी नहीं है। वह यह सब जानते हैं और उन्हें इसका एहसास है। इसीलिए अब उन्होंने उपलब्धियों के नाम पर दूसरों के द्वारा करवाए हुए कामों का सहारा लेना शुरू कर दिया है चाहे वह नारनौल हो रेवाड़ी हो या गुड़गांव सब जगह आजकल उनका यही तरीका है। इस कमजोरी के एहसास के कारण ही राव ने पिछले कुछ महीने से अपनी राजनीति का तरीका कुछ बदला है। अब वह लोगों की शादी समारोह एवं शोक सभाओं में भी आने लग गए हैं और अब तो उन्हें किसानों के नुकसान की चिंता भी होने लगी है। ओलावृष्टि के बाद सरसों के खेतों में खड़े होकर फोटो खिंचवा कर वह राजा से जन नेता बनने के रास्ते पर चलने का प्रयत्न कर रहे हैं। राव की इस विवशता का श्रेय उन राजनीतिक नेताओं को है जिन्होंने काम की राजनीति की इस जिले में शुरुआत की है और जिनके बारे में राव आजकल बहुत ही चिंतित एवं सावधान नजर आने लगे हैं। अब देखना यह है कि राव अपने आप को कितना बदल पाएंगे परंतु यह सत्य है जिस विरासत को वह बेटी को सौंपने का प्रचार कर रहे हैं वह विरासत तो कभी की उन्होंने अपनी अकर्मण्यता से खत्म कर दी। अब तो वक्त की नजाकत यह कहती हैं कि अपने आपको जनाकांक्षाओं के अनुरूप ढालने की कोशिश करें। अगर समय रहते नहीं बदले तो वक्त ने बड़े बड़ों को बदल दिया हैऔर वक्त सब कुछ सिखा देगा।