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  • Gadchiroli में खनन विधेयक पास, कंपनियों की लाइन, आदिवासी गुस्से में, क्या होगा अगला कदम?

    Gadchiroli में खनन विधेयक पास, कंपनियों की लाइन, आदिवासी गुस्से में, क्या होगा अगला कदम?

    Gadchiroli: 30 जून को महाराष्ट्र सरकार ने गढ़चिरौली जिले में खनन स्वीकृतियों में तेजी लाने और खनिज आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत प्राधिकरण स्थापित करने के लिए विधानसभा में एक विधेयक पेश किया. गढ़चिरौली जिला खनन प्राधिकरण (जीडीएमए) के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अध्यक्ष होंगे.

    इस विधेयक के अनुसार, प्राधिकरण के पास सभी मौजूदा कानूनों को दरकिनार करने की शक्ति होगी और किसी भी अदालत को इसके किसी भी कार्य या आदेश के खिलाफ कोई मुकदमा/कार्यवाही चलाने का अधिकार नहीं होगा.

    7 जुलाई को इस विधेयक को महाराष्ट्र विधान परिषद ने पारित कर दिया. 7 जुलाई को ही महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री उदय सामंत ने गढ़चिरौली को एक स्टील उत्पादन केंद्र में बदलने के लिए एक लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की.

    कंपनियों के इस आगमन से स्थानीय आदिवासी आक्रोशित हैं. आदिवासी कार्यकर्ता लालसू नुगोटी बताते हैं कि गढ़चिरौली जिले में खदानें खोलने के लिए कंपनियों की लाइन लगी हुई हैं. आने वाले दिनों में पूरे जिले में कुल 25 जगहों पर खदान खोलने का प्रस्ताव है.

    सुरजागढ़ पहाड़ी शृंखला के दूसरे तरफ भी खदान का विस्तार किया जा रहा है जिसमें छह ब्लॉक अलग-अलग कंपनियों को दिया गया है. इनमें जिंदल का जेएसडब्ल्यू ग्रुप और रायपुर स्थित नेचुरल रिसोर्सेज़ एनर्जी कंपनी भी शामिल हैं. कोरची तहसील की जेंडेपाड़ पहाड़ी और भामरागढ़ तहसील के बाबलाई पहाड़ में भी लौह खदान खोलने का प्रस्ताव है.

    Gadchiroli में खनन विधेयक पास, कंपनियों की लाइन, आदिवासी गुस्से में, क्या होगा अगला कदम?

    लौह अयस्क के अलावा, अडानी समूह की यूनिट अंबुजा सीमेंट्स को गढ़चिरौली के देवलमारी कटेपल्ली क्षेत्र चूना पत्थर खनन के लिए भी अनुमति दी गई है. यह लगभग 538 हेक्टेयर क्षेत्र में स्थित है, जिसमें लगभग 150 मिलियन टन चूना पत्थर होने का अनुमान है.

    ग्रामसभा के अध्यक्ष देवसाय आतला ने बताया कि अभी चामोर्षी तालुका में 1200 हेक्टेयर क्षेत्र में बॉक्साइट के खनन की कोशिशें की जा रही हैं. वहां पर किसी आदिवासी कंपनी को आगे रखकर इलाके को 90 साल के लिए लीज़ पर लेने की योजना है.

    देवसाय ने द वायर हिंदी को बताया, ‘चूंकि यह इलाका पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है, यहां कोई बाहरी कंपनी जमीनें नहीं ले सकती. इसलिए कोई बाहरी कंपनी किसी आदिवासी के नाम पर कंपनी बनाएगी, और पहले उस जमीन को उसके नाम करके, बाद में उससे लीज पर ले लेगी.’ सुरजागढ़ क्षेत्र में खनन का शुरू से ही स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे हैं. इसको लेकर कई संघर्ष हुए हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनियों ने उन्हें धोखा दिया और अवैध रूप से उनकी ज़मीन हड़प कर उसमें खनन का काम शुरू किया.

    स्थानीय लोगों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम (2006) के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के तहत उनकी सहमति लेने की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई. उनका कहना है कि यहां उत्खनन कानून, पर्यावरण कानून और पेसा कानूनों को ताक पर रखकर खनन कार्य किया जा रहा है.

    पोट्टेगांव के आदिवासी विकास परिषद के कार्यकर्ता विनोद मंडावी ने आरोप लगाया कि 2010 में गढ़चिरौली के कलेक्टर ने फर्जी ग्रामसभाओं के दस्तावेज बनाकर खनन के लिए लोगों की समहति दिखाई. ऐसी फर्जी ग्रामसभाओं के दस्तावेज एटापल्ली ब्लॉक के दमकोंडावाही, बांडे इलाके में गांव के ग्रामसेवकों के जरिए बनाया गया.

    वर्ष 2023 में सुरजागढ़ खनन के खिलाफ करीब आठ महीने चले 70 से अधिक गांवों के आदिवासियों के शांतिपूर्ण धरने पर पुलिस ने हमला करके उसे बंद करवा दिया.