हरियाणा के वरिष्ठ नेता और परिवहन मंत्री Anil Vij ने कथावाचकों और संतों के बीच फर्क को लेकर बड़ी बात कही है। उनका कहना है कि आजकल कई लोग खुद को धार्मिक गुरु या प्रवचनकर्ता बताकर समाज में भ्रम फैला रहे हैं। जबकि असली संत बनने के लिए केवल शास्त्र पढ़ लेना काफी नहीं होता बल्कि आत्मज्ञान और आध्यात्मिकता की ऊंचाई तक पहुंचना जरूरी होता है।
कथावाचक बनना अब आसान हो गया है
अनिल विज ने साफ कहा कि आज कोई भी चार किताबें पढ़कर खुद को कथावाचक कहने लगता है। सोशल मीडिया और पब्लिसिटी के ज़माने में ये लोग स्टेज पर आकर कुछ मनगढ़ंत बातें करते हैं और भीड़ जुटा लेते हैं। वे कई बार विवादित और असंगत बयान भी देते हैं जिससे लोगों की भावनाएं आहत होती हैं। यही वजह है कि कथावाचकों को लेकर हाल के समय में कई बार विरोध हुआ है।

संत कौन होते हैं: विज की परिभाषा
विज के अनुसार संत वही होता है जिसने ईश्वर को जाना हो। उसने सांसारिक मोह को त्याग दिया हो और अपनी जीवन यात्रा को समाज और धर्म की सेवा में समर्पित कर दिया हो। संत किसी प्रचार के लिए नहीं बल्कि आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए बोलते हैं। उनका हर वचन गहन ज्ञान और अनुभव से भरा होता है।
लोगों को किसकी सुननी चाहिए?
विज ने जनता से अपील की है कि वे केवल भाषणों और कथाओं के बहाव में न बहें। उन्होंने कहा कि समाज को यह पहचानने की जरूरत है कि कौन सच्चा संत है और कौन केवल पाखंड फैला रहा है। हमें ऐसे लोगों के पीछे नहीं चलना चाहिए जो केवल मनोरंजन और प्रसिद्धि के लिए मंच पर आते हैं। असली संतों के उपदेशों में जीवन को दिशा देने वाली बातें होती हैं।
समाज की जिम्मेदारी है सच को पहचानना
आज के समय में जब सोशल मीडिया पर हर कोई खुद को गुरु साबित करने में लगा है तब समाज की जिम्मेदारी है कि वह विवेक से काम ले। विज के अनुसार संत बनना तपस्या का परिणाम होता है जबकि कथावाचक बनना सिर्फ ज्ञान के आभास से जुड़ा होता है। हमें अपनी श्रद्धा का केंद्र उन लोगों को बनाना चाहिए जो वाणी से नहीं आचरण से सिखाते हैं।


