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    Rajasthan: राजस्थान में कलेक्टरों को जारी किए गए निर्देश, इन ग्राम पंचायतों के प्रस्ताव हो सकते हैं निरस्त

    Rajasthan News: ग्राम पंचायत (Gram Panchayat) भारत के ग्रामीण इलाकों में सबसे निचली स्तर की लोकतांत्रिक व्यवस्था होती है। यह गांव के विकास कार्यों जनकल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन और ग्रामीण समस्याओं के समाधान के लिए जिम्मेदार होती है। हर ग्राम पंचायत का प्रमुख सरपंच (Sarpanch) होता है जिसे गांव की जनता सीधे वोट देकर चुनती है। इसके साथ ही ग्राम पंचायत में पंच होते हैं जो गांव के अलग-अलग वार्डों से चुने जाते हैं।

    ग्राम पंचायतें पंचायती राज प्रणाली का आधार होती हैं और यह न केवल प्रशासनिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी ग्रामीण जीवन को दिशा देती हैं। राजस्थान जैसे बड़े राज्य में हजारों ग्राम पंचायतें हैं जिनके पुनर्गठन का काम इन दिनों चर्चा में है।

    पंचायत पुनर्गठन को लेकर मचा घमासान

    राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग (Panchayati Raj Department) की ओर से पूरे राज्य में ग्राम पंचायतों और पंचायत समितियों का पुनर्गठन (Reorganization) किया जा रहा है। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि प्रशासनिक व्यवस्था को और बेहतर बनाया जा सके और लोगों तक सरकारी योजनाएं जल्दी और सही तरीके से पहुंच सकें। लेकिन इस प्रक्रिया में कई जिलों से भारी आपत्तियां सामने आ रही हैं जिससे यह मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है।

    कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि इस पुनर्गठन की प्रक्रिया में सत्ताधारी पार्टी के दबाव में आकर अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। उनके मुताबिक प्रस्ताव तैयार करते वक्त कई बार तय मानकों से ज्यादा छूट (relaxation) दी गई है जो पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।

    कांग्रेस ने लगाए मनमानी के आरोप

    कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पंचायतों और ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन में सत्ता पक्ष ने अपने हिसाब से नए गांवों की संरचना तय करवाई है। कहीं एक ही परिवार के दबाव में नई ग्राम पंचायत बना दी गई तो कहीं पर राजनीतिक लाभ के लिए पंचायत समिति की सीमाएं बदल दी गईं।

    इन नेताओं का यह भी दावा है कि पंचायतीराज विभाग के अधिकारी उन गांवों को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां सत्ताधारी दल का वोट बैंक मजबूत है। इससे न सिर्फ लोकतंत्र की नींव कमजोर हो रही है बल्कि ग्रामीण जनता में भी असंतोष बढ़ता जा रहा है।

    प्रस्तावों में तय शिथिलता से ज्यादा छूट

    पंचायतीराज विभाग ने पुनर्गठन के लिए कुछ तय मानक बनाए हैं। सामान्य और अनुसूचित क्षेत्रों के जिलों में अधिकतम 15 प्रतिशत तक और मरुस्थलीय जिलों में 20 प्रतिशत तक विचलन की छूट दी गई है। लेकिन कई जिलों से मिली जानकारी के अनुसार इन मानकों से भी कहीं अधिक छूट देकर प्रस्ताव बनाए गए हैं।

    कुछ जगहों पर यह छूट 25 से 30 प्रतिशत तक पहुंच गई जो नियमों के पूरी तरह खिलाफ है। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी कर राजनीतिक दबाव में आकर प्रस्ताव तैयार किए हैं।

    कलक्टरों को लिखा सख्त पत्र

    मामला तूल पकड़ने के बाद पंचायतीराज विभाग के शासन सचिव डॉ. जोगाराम ने सभी जिलों के जिला कलक्टरों को एक सख्त पत्र भेजा है। इसमें उन्होंने कहा है कि पुनर्गठन के लिए तय किए गए नियमों और मानकों के तहत ही प्रस्ताव तैयार किए जाएं।

    पत्र में साफ कहा गया है कि जिन प्रस्तावों में निर्धारित मानकों से ज्यादा शिथिलता दी गई है उन्हें निरस्त (cancelled) कर दिया जाएगा। साथ ही अधिकारियों से पारदर्शिता (transparency) बरतने की सख्त हिदायत दी गई है।

    पारदर्शिता के नाम पर राजनीति?

    विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायत पुनर्गठन एक गंभीर प्रशासनिक कार्य है लेकिन इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप से इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है लेकिन जिस तरीके से मानकों से छेड़छाड़ हो रही है उससे साफ है कि यह सिर्फ सत्ता के हित में किया जा रहा है।

    राजस्थान जैसे राज्य में जहां ग्रामीण जनसंख्या का बड़ा हिस्सा रहता है वहां पंचायत प्रणाली का सही तरीके से काम करना बेहद जरूरी है। लेकिन यदि पुनर्गठन का आधार ही राजनीति बन जाए तो यह ग्रामीण लोकतंत्र की मूल आत्मा को चोट पहुंचा सकता है।

    जिलों से मिल रही हैं लगातार आपत्तियां

    झुंझुनूं, सीकर, नागौर, बाड़मेर, जैसलमेर जैसे जिलों से अब तक सैकड़ों आपत्तियां (objections) दर्ज करवाई गई हैं। इन आपत्तियों में कहा गया है कि न तो ग्राम पंचायतों के प्रस्ताव बनाते समय गांव के लोगों से राय ली गई और न ही सरपंचों या पंचायत सदस्यों को विश्वास में लिया गया।

    कई गांवों में तो लोगों को यह भी नहीं पता कि उनकी पंचायत समिति किस क्षेत्र में जा रही है। इससे ग्रामीणों में असंतोष है और लोग प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं।