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  • पढ़ी-लिखी महिला को एलिमनी क्यों चाहिए? Supreme Court का बड़ा सवाल

    पढ़ी-लिखी महिला को एलिमनी क्यों चाहिए? Supreme Court का बड़ा सवाल

    Supreme Court: मुंबई की एक महिला ने अपने पति से तलाक के बाद कोर्ट में बड़ी मांगें रखीं। महिला ने भरण-पोषण के लिए हर महीने 1 करोड़ रुपये, एक महंगी BMW कार और मुंबई में एक फ्लैट की मांग की। यह मामला तेजी से मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गया। महिला का दावा था कि उसने अपनी शादी में मानसिक और भावनात्मक परेशानी झेली है। वहीं, पति ने इन मांगों को अस्वीकार कर दिया और कहा कि ये अत्यधिक और अव्यावहारिक हैं।

    सीजेआई की खरी-खरी: खुद कमाओ और खाओ

    सुप्रीम कोर्ट में जब यह मामला पहुंचा तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बी आर गवई की बेंच ने महिला से सख्त सवाल पूछे। उन्होंने साफ कहा कि अगर महिला इतनी पढ़ी-लिखी है तो उसे खुद कमाकर अपना खर्चा चलाना चाहिए। उन्होंने तल्ख लहजे में पूछा कि शादी केवल 18 महीने चली और आप हर महीने एक करोड़ रुपये कैसे मांग सकती हैं? एक शिक्षित महिला को बेरोजगार बैठने की इजाजत नहीं हो सकती।

    पढ़ी-लिखी महिला को एलिमनी क्यों चाहिए? Supreme Court का बड़ा सवाल

     पढ़ाई है तो जिम्मेदारी भी उठाओ: कोर्ट का संदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने बयान में यह स्पष्ट कर दिया कि समाज में महिलाओं को शिक्षा दिलाने का उद्देश्य उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। अगर कोई महिला उच्च शिक्षा प्राप्त करती है तो यह अपेक्षित है कि वह खुद की कमाई से अपनी जरूरतें पूरी कर सके। कोर्ट ने कहा कि यह मामला समानता की भावना को कमजोर करता है और शिक्षा के उद्देश्य पर सवाल उठाता है।

     कोर्ट ने समझौते का सुझाव दिया

    चीफ जस्टिस ने महिला को सलाह दी कि या तो वह मुंबई में एक फ्लैट लेकर संतुष्ट हो जाए या चार करोड़ रुपये लेकर एक अच्छी नौकरी की तलाश करे। कोर्ट ने दोनों पक्षों से इस दिशा में समझौते की बात कही और कहा कि अगर आपसी सहमति बनती है तो यह सभी के लिए बेहतर होगा। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले को रद्द करने और निर्णय सुरक्षित रखने का आदेश भी दे दिया।

    समाज को मिला एक नया दृष्टिकोण

    इस मामले ने समाज में एक नई सोच की लहर पैदा की है। जहां एक तरफ महिलाओं के अधिकारों की बात होती है वहीं सुप्रीम कोर्ट ने आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दी है। कोर्ट का यह रुख संकेत करता है कि अब महिलाओं को केवल सहानुभूति की नहीं बल्कि बराबरी की सोच और मेहनत की जरूरत है। यह फैसला आने वाले समय में कई ऐसे मामलों की दिशा बदल सकता है।