जींद का श्री जयंती देवी मंदिर (सिद्धपीठ) हरियाणा की सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की स्थापना को लेकर यूं तो कई मान्यताएं है लेकिन दो मान्यताएं सबसे ज्यादा हैं। इसी मंदिर के नाम पर शहर का नाम जींद पड़ा। बताते हैं कि पहले शहर का नाम जयंत परी था जो बाद में बदलकर जींद हो गया। मंदिर में नवरात्रों में विशेष मेला लगता है। चैत्र और शारदीय नवरात्रों की छठ को यहां विशाल जागरण आयोजित किया जाता है और अगले दिन यानी की सप्तमी को यहां मेला लगता है। मेले में शहर के लगभग हर घर से लोग दर्शनों के लिए माता के दरबार में आते हैं। मंदिर में एक अलग से गुप्त नवरात्रों में 11000 कन्याओं के पूजन का भी कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इतनी कन्याओं का एक साथ पूजन अपने आप में बड़ा कार्यक्रम है और इसमें लगभग सभी स्कूलों से बच्चियों को मंदिर लाया जाता है। उनका पूजन करने के बाद उन्हें उनके स्कूल भेजा जाता है।
मंदिर के निर्माण को लेकर कहानियां
एक किंवदंती के अनुसार, समुद्र मंथन के समय देव सेनापति जयंत ने असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए जयंती देवी की आराधना की थी, जिसके बाद उन्हें जीत का आशीर्वाद मिला। इसके बाद उन्होंने यहां मंदिर की स्थापना की। दूसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। कहां जाता है कि महाभारत काल में पांडवों ने कौरवों के खिलाफ युद्ध में विजय पाने के लिए भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर मां जयंती देवी की पूजा की थी और जीत के बाद पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। कथा चाहे समुद्र मंथन से जुड़ी हो या महाभारत काल से हजारों लाखों साल पुराने इस मंदिर को लेकर कोई एक मत नहीं है। दोनों ही मतों को लेकर इनका वर्णन अलग-अलग ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। जहां तक सवाल समुद्र मंथन की कथा का है तो एक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण भगवान इंद्र के पुत्र जयंत ने करवाया था। सागर मंथन के दौरान, अमृत कलश लेकर जयंत उत्तर दिशा की ओर भागे थे। असुरों ने ब्रह्मवर्त क्षेत्र तक उनका पीछा किया। ब्रह्मवर्त एक पवित्र क्षेत्र होने के कारण, वे उसमें प्रवेश नहीं कर सकते थे। इसे सुरक्षित स्थान मानकर, जयंत यहीं रुक गए और उन्होंने इस स्थान पर इस मंदिर बनवाया। जो भी हो जयंती देवी मंदिर ‘विजय की देवी’ को समर्पित है और इसका गहरा पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है, जो महाभारत काल और समुद्र मंथन से जुड़ा है।

जयंती की महिमा आज भी बरकरार
जीत की देवी जयंती देवी की महिमा आज भी इतनी ही बरकरार है। समुद्र मंथन महाभारत काल के बाद आजादी से पहले जब रियासतों का दौर था उस समय जींद के राजा इन्हें अपने कुलदेवी मानते थे। जयंती देवी मंदिर के मुख्य भवन के साथ में राजराजेश्वरी मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। एक बार जींद के राजा जब युद्ध के लिए जा रहे थे तो वह पहले अपनी कुलदेवी जयंती देवी की पूजा के लिए आए और उनसे जीत का आशीर्वाद लेने के बाद वह लिजवाना में युद्ध के लिए गए। युद्ध में जीत के बाद जींद के राजा ने यहां राज-राजेश्वरी मंदिर की स्थापना करवाई।
नवरात्रों में विशेष मेला
मंदिर के पुजारी नवीन शास्त्री बताते हैं कि जयंती देवी को विजय की देवी के रूप में पूजा जाता है, और यह माना जाता है कि उनकी पूजा करने से विजय और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यहां हर साल नवरात्रों में छठ को विशाल जागरण का आयोजन किया जाता है और सप्तमी को विशाल मेला लगता है। नवीन शास्त्री ने बताया कि इस बार रविवार को यहां जागरण का आयोजन होगा और सोमवार को मेला लगेगा। उन्होंने बताया कि जींद का नाम जयंती देवी के नाम पर ही रखा गया है मंदिर के आसपास पहले जयंत परी नामक शहर बसा था जिसे बाद में जींद के नाम से जाना जाने लगा।
जयंती पुरातात्विक संग्रहालय
जींद का जयंती देवी मंदिर एक प्राचीन शक्तिपीठ है। जयंती देवी मंदिर के प्रांगण में स्थित इस संग्रहालय में जींद जिले का इतिहास और संस्कृति प्रदर्शित की गई है। संग्रहालय में प्राचीन अवशेष, मूर्तियां, शिलालेख और अन्य ऐतिहासिक वस्तुएं रखी गई हैं। इसकी स्थापना 28 जुलाई 2007 को हुई थी और यह जींद जिले के इतिहास को जानने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है।

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