Navratri Special: शिवालिक की तलहटी में स्थित माता मनसा देवी मंदिर को वर्तमान में माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड चलाता है। इस मंदिर में हर नवरात्रों में हरियाणा के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, मंत्री और दूसरे नेता और अधिकारी विशेष दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।
मंदिर की कहानी
कहा जाता है कि, शिवालिक पहाड़ियों में, एक गाय प्रतिदिन आती थी और पहाड़ी की चोटी पर तीन सटे पत्थरों (पिंडियों) पर दूध चढ़ाती थी। स्थानीय निवासियों ने यह देखा तो पाया कि वहां तीन पवित्र शिलाएं थीं। इसके बाद उनकी पूजा की जाने लगी और यह श्री सती का मस्तक निकला। श्री सती का मस्तक निकलने की बात कही जरूर जाती है, लेकिन इसके प्रमाण नहीं हैं। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर आज माता मनसा देवी मंदिर है, यहां सती माता के सिर का अगला भाग गिरा था। मनसा देवी का मंदिर पहले माता सती के मंदिर के रूप में जाना जाता था।
मंदिर का निर्माण
मनीमाजरा के महाराजा गोपाल सिंह ने श्री मनसा देवी का वर्तमान मुख्य मंदिर 1811 से 1815 की अवधि के दौरान बिलासपुर गांव, तहसील और जिला पंचकूला में बनवाया। शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बने इस मुख्य मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर पटियाला मंदिर है जिसका निर्माण वर्ष 1840 में तत्कालीन महाराजा पटियाला श्री करम सिंह ने करवाया था। इस मंदिर को मनीमाजरा राज्य का संरक्षण प्राप्त था। मनीमाजरा के राजा ने तब इस मंदिर के लिए पुजारी को ‘खिदमतगार’ नियुक्त किया, जिनका कर्तव्य मंदिर के देवता की पूजा करना था। रियासत के पेप्सू में विलय के बाद, ये पुजारी मंदिर और मंदिर से जुड़ी भूमि के मामलों के नियंत्रण और प्रबंधन के मामले में स्वतंत्र हो गए। वे न तो इस मंदिर का रखरखाव कर सकते थे और न ही आने वाले भक्तों को आवश्यक सुविधाएं प्रदान कर सकते थे और इस प्रकार मंदिर की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब होती गई। इतना अधिक कि तीर्थयात्रियों के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं थी।

महल से मंदिर तक गुफा
मनीमाजरा के राजा गोपालदास ने अपने किले से मंदिर तक एक गुफा बनवाई थी, जो लगभग 3 किलोमीटर लंबी है। वह अपनी रानी के साथ प्रतिदिन इस गुफा से माता सती के दर्शन करने जाते थे। जब तक राजा प्रकट नहीं होते थे, तब तक मंदिर का कपाट नहीं खुलता था।
ब्रह्मांडीय ऊर्जा का दिव्य रूप
बिलासपुर गांव की सीमा से लगे 100 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। मनसा देवी मंदिर ने शक्ति (मनसा देवी) की पूजा के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल होने की पवित्रता बनाए रखी है, जो कि जन्मजात ब्रह्मांडीय ऊर्जा का दिव्य रूप है, जिसे हिंदू धर्म और शक्तिवाद में ब्रह्मांड की शक्तियों का प्रतीक और शासन करने वाला कहा जाता है। पूरा मंदिर परिसर शिवालिक तलहटी के लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर का मुख्य आकर्षण एक वृक्ष है जिसके चारों ओर भक्त अपनी प्रार्थनाओं का उत्तर पाने के लिए पवित्र धागे बांधते हैं।
मंदिर में अद्भुत कारीगरी
यह मंदिर अद्भुत रूप से डिज़ाइन किया गया है, जिसमें मुख्य मंदिर में दीवार चित्रों के अड़तीस पैनल हैं, इसके अलावा दीवारों और छत पर पुष्प डिजाइन हैं। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में महाराजा गोपाल सिंह द्वारा निर्मित, यह उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध शक्ति मंदिरों में से एक है। देश के इस हिस्से में शक्तिवाद सबसे ज़्यादा प्रचलित मान्यताओं में से एक है, और उत्तरी राज्यों के कई राज्यों में मनसा देवी के महत्वपूर्ण मंदिर हैं। इस मंदिर का रखरखाव अब सरकार द्वारा एक धरोहर स्थल के रूप में किया जाता है।
मंदिर का प्रबंधन
हरियाणा सरकार ने 9 सितंबर 1991 में मंदिर के प्रबंधन और रखरखाव के लिए श्री माता मनसा देवी श्राइन बोर्ड का गठन कर इस मनसा देवी परिसर को अपने हाथों में ले लिया था। अब यह श्राइन बोर्ड ही मंदिर के सारे कार्य को देखता है।
नवरात्र मेला
पंचकूला का माता मनसा देवी मंदिर बेहद खास है। इस मंदिर का इतिहास बड़ा ही प्रभावशाली है। माता मनसा देवी मंदिर में चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मेला लगता है। जिसके चलते यहां लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं। यहां लोग माता से अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए आशीर्वाद लेते हैं। माना जाता है कि माता मनसा देवी से मांगी गई हर मुराद माता पूरी करती है।
मंदिर की मूर्ति
मनसा देवी के मुख्य मंदिर में माता की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के आगे तीन पिंडियां हैं, जिन्हें मां का रूप ही माना जाता है। ये तीनों पिंडियां महालक्ष्मी, मनसा देवी और सरस्वती देवी के नाम से जानी जाती हैं। मंदिर की परिक्रमा पर गणेश, हनुमान, द्वारपाल, वैष्णों देवी, भैरव की मूर्तियां एवं शिवलिंग स्थापित है।
कौन है मनसा देवी ?
इस मंदिर को लेकर एक कथा यह भी है कि भगवान शिव और माता पार्वती की छोटी पुत्री माना जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। महाभारत के अनुसार इनका वास्तविक नाम जरत्कारु है और इनके समान नाम वाले पति महर्षि जरत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इन्हें शिव और पार्वती की पुत्री तथा विष की देवी के रूप में भी माना जाता है। 14वीं सदी के बाद इन्हे शिव के परिवार की तरह मंदिरों में आत्मसात किया गया। यह मान्यता भी प्रचलित है कि इन्होने शिव को हलाहल विष के पान के बाद बचाया था, परंतु यह भी कहा जाता है कि मनसा का जन्म समुद्र मंथन के बाद हुआ।