प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाम का ऐलान अभी तक नहीं हो पाया है। कांग्रेस हाईकमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाम को लेकर उहापोह की स्थिति में है। इस बीच माना जाता है कि कांग्रेस 53 साल बाद अहीरवाल बेल्ट से किसी नेता को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना सकती है।
पार्टी के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा कैप्टन अजय सिंह यादव के नाम की है। छह बार विधायक, तीन बार मंत्री और 2005 में विपक्ष के नेता रहे यादव गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय ओबीसी विभाग के प्रमुख भी रह चुके हैं। उनके समर्थक कहते हैं कि उनका लंबा प्रशासनिक अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और अहीरवाल में जनाधार उन्हें सबसे मजबूत दावेदार बनाते हैं। यादव परिवार का कांग्रेस से पुराना रिश्ता रहा है। उनके राव अभय सिंह तीन बार विधायक रहे, जबकि उनके पुत्र चिरंजीव राव वर्तमान में रेवाड़ी से विधायक हैं।

अजय सिंह यादव के अलावा पूर्व मंत्री राव नरेंद्र सिंह, राव दान सिंह और पूर्व विधायक चिरंजीव राव के नाम भी सुर्खियों में हैं। राव नरेंद्र सिंह को परिवार की राजनीतिक विरासत और पारंपरिक समर्थन हासिल है। राव दान सिंह की गुड़गांव में मजबूत पकड़ है, जबकि युवा नेता चिरंजीव राव को अगले जनरेशन का चेहरा माना जा रहा है।
दरअसल, 1972 के बाद से दक्षिण हरियाणा (अहीरवाल बेल्ट) से कोई भी नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बना। इस क्षेत्र से आखिरी कांग्रेसी अध्यक्ष राव निहाल सिंह थे। तब से लेकर अब तक प्रदेश अध्यक्ष का पद खासकर उत्तर और मध्य हरियाणा के नेताओं के पास ही रहा। 2019 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को अहीर-बहुल 11 सीटों में से सिर्फ एक सीट मिली, जबकि भाजपा ने यहां अपनी मजबूत पकड़ बना ली। यही कारण है कि अब पार्टी के भीतर से इस क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देने की मांग जोर पकड़ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हुड्डा और शैलजा के बीच चल रही गुटबाजी ने संगठन को कमजोर किया है। अगर प्रदेश अध्यक्ष का पद दक्षिण हरियाणा को मिलता है, तो यह हुड्डा खेमे के लिए झटका हो सकता है।
1972 के बाद से अब तक प्रदेश अध्यक्ष का पद खासकर उत्तर और मध्य हरियाणा के नेताओं के पास ही रहा। भूपेंद्र सिंह हुड्डा अब तक प्रदेश संगठन पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं और उत्तर-मध्य हरियाणा से नेतृत्व उनकी ताकत का केंद्र रहा है। नया अध्यक्ष दक्षिण हरियाणा से आने पर उनकी संगठन पर मजबूत पकड़ कमजोर पड़ सकती है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि दक्षिण हरियाणा से नया अध्यक्ष बनाना कांग्रेस के लिए रणनीतिक मजबूरी भी है और आंतरिक खींचतान का दांव भी। यह तय करेगा कि हुड्डा का कद बरकरार रहता है या पार्टी नए समीकरणों से प्रदेश की राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश करती है।
हरियाणा कांग्रेस के अंदर क्षेत्रीय आकांक्षाओं को साधना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। उत्तर और मध्य हरियाणा के नेता, जिन्होंने पार्टी को प्रासंगिक बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है, आसानी से अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं होंगे। साथ ही, आलोचकों का कहना है कि वंशवाद पर अधिक निर्भरता पार्टी के लिए उलटा असर भी डाल सकती है।










