15 अगस्त 1947 को नहीं आजाद हुआ था जींद! देश की आजादी के 202 दिन बाद 5 मार्च 1948 को आजाद हुआ जींद

15 अगस्त 1947 को नहीं आजाद हुआ था जींद! देश की आजादी के 202 दिन बाद 5 मार्च 1948 को आजाद हुआ जींद

देश आजादी की 78वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। इस आजादी के बहुत मायने हैं। लेकिन बात अगर हरियाणा के जींद की की जाए तो जींद 15 अगस्त 1947 को आजाद नहीं हुआ था। भले ही जींद इस दिन आजाद न हुआ हो, लेकिन यहां के लोगों ने उस समय जश्न मनाया था जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया।

असल में अंग्रेजों ने भारत को आजाद करते समय रियासतों को इस बात की छूट दी कि वह चाहें तो भारत में शामिल हो जाएं और चाहें तो अपना अलग अस्तित्व बनाकर रखें। उस समय जींद रियासत थी। जींद के राजा रणबीर सिंह ने अपना अलग अस्तित्व बनाए रखने का फैसला किया।

जींद के लोग राजा के इस फैसले से खुश नहीं थे और उन्होंने प्रजामंडल का गठन कर दिया। जींद से दादरी तक फैली जींद रियासत का हर व्यक्ति राजा के फैसले से दुखी था और इसके बाद राजा ने यहां के लोगों पर अत्याचार करने शुरू कर दिए जिससे लोगों में दिन प्रतिदिन गुस्सा बढ़ता चला गया। जींद रियासत के चौधरी निहाल सिंह तक्षक को जनवरी 1947 में संविधान सभा का सदस्य भी बनाया गया था।

15 अगस्त 1947 को नहीं आजाद हुआ था जींद! देश की आजादी के 202 दिन बाद 5 मार्च 1948 को आजाद हुआ जींद

निहाल सिंह तक्षक की संविधान सभा के सदस्य होने के नाते सरदार वल्लभभाई पटेल से लगातार मुलाकात होती रहती थी और सरदार वल्लभभाई पटेल की सलाह के बाद फरवरी 1948 में दादरी में जींद प्रजामंडल की बैठक हुई और फैसला लिया गया कि दादरी को जींद रियासत से अलग करके हिसार जिले में मिला दिया जाए। इतिहास के जानकार लोग बताते हैं की प्रजामंडल में इस का प्रस्ताव पास होने के बाद एक जुलूस निकाला गया जिसमें 10000 लोग शामिल हुए।

निहाल सिंह तक्षक कि यह बगावत राजा से सहन नहीं हुई और उसने 21 फरवरी 2048 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। तीन दिन बाद चौधरी दलसिंह, मेजर मीर सिंह और चौधरी लहरी सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया। जींद के राजा की इस मनमानी का विरोध करने के लिए मेहताब सिंह, लाला रामकिशन गुप्ता, पंडित श्योकरण, चौधरी हीरा सिंह चिनारिया की आवाज पर एक सभा आयोजित की गई जिसमें करीब 35000 महिला और पुरुषों ने भाग लिया और इसमें सरस्वती से फैसला किया गया कि जींद रियासत के समानांतर सरकार बना दी जाए।

इसमें चौधरी महताब सिंह को नया राजा घोषित कर दिया गया और किले के अंदर सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों के लिए खाने-पीने की सामग्री के अलावा कुछ भी नहीं जाने देने का फैसला किया गया। इसके साथ ही लोगों ने बाढ़डा के थाने को भी लोगों ने घेर लिया। अब जिद के राजा को लगने लगा था की हालत उसके नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं और लोगों की बगावत का सामना करना उसके वश की बात नहीं है। ऐसे में राजा ने अपना प्रतिनिधि भारत सरकार के पास भेज कर आत्म समर्थन का प्रस्ताव रखा और 5 मार्च 1948 को राजा रणबीर सिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया।

इसके साथ ही भारत सरकार ने उसी दिन सात रियासतों जींद, पटियाला, नाभा, मलेरकोटला, कपूरथला, नालागढ़ और फरीदकोट को तोड़कर पंजाब एंड ईस्ट पंजाब स्टेट यूनियन अर्थात पेप्सी का गठन किया गया। जींद को अलग जिला बना दिया गया। जींद रियासत के हिस्से रहे दादरी को महेंद्रगढ़ जिले में मिला दिया गया।

पेप्सू करने के बाद निहाल सिंह तक्षक, हरनाम सिंह दल सिंह राम राय पेप्सू की पहली विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। जींद रियासत होने के चलते यहां के लोगों ने हालांकि बहुत ज्यादा लड़ाई तो अंग्रेजों से नहीं लड़ी है लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे जरूर थे जो रियासत से अलग देश की आजादी में अपनी भूमिका निभा रहे थे। यही वह लोग भी थे जिन्होंने देश की आजादी के बाद जींद रियासत को तोड़ने के लिए प्रजामंडल का गठन किया और साथ ही जींद के राजा के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने का काम किया। इन लोगों में वैद्य देवीदयाल का नाम भी प्रमुख है।

जब देश आजाद हुआ और 15 अगस्त को आजादी के पहले जश्न की तैयारी हो रही थी उस समय जींद भले ही आजाद नहीं हुआ था, लेकिन लोगों का उत्साह इतना था कि लोग दिल्ली जाने के लिए रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए और जब दिल्ली के लिए ट्रेन आई तो वह 2 मिनट में ही खचाखच भर गई और इसमें पांव रखने की भी जगह नहीं बची लोग ट्रेन की खिड़कियों पर लटक कर दिल्ली जाने को तैयार थे।

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