Haryana News: सुनीता के संघर्ष का सम्मान, राष्ट्रपति सम्मान पाने वाली हरियाणा की एकमात्र शिक्षिका

Haryana News: सुनीता के संघर्ष का सम्मान, राष्ट्रपति सम्मान पाने वाली हरियाणा की एकमात्र शिक्षिका

Haryana News: सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। शिक्षक दिवस पर सोनीपत जिले के गांव नसीरपुर की रहने वाली सामाजिक विज्ञान की अध्यापिका सुनीता ढुल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिल्ली में शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में उनके अद्वितीय योगदान और समर्पण के लिए प्रदान किया गया। इस वर्ष हरियाणा से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाने वाली वह एकमात्र शिक्षिका हैं। वर्तमान में वह पीएम श्री राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, मुरथल अड्डा में सेवाएं दे रही हैं।

राष्ट्रपति द्वारा दिया गया सुनीता को यह सम्मान वास्तव में सुनीता के संघर्ष का भी सम्मान है। सुनीता का सफर कभी आसान नहीं रहा। उनके पिता राज सिंह दहिया, जो पहले आर्मी में थे और बाद में बिजली निगम में कार्यरत हुए, ने समाज की परवाह किए बिना अपनी बेटियों को पढ़ाने का फैसला लिया। जब ग्रामीण समाज ताने देता था कि “बेटियों को क्यों पढ़ा रहे हो”, उनके पिता का जवाब होता, “बेटी भी पढ़-लिखकर बदलाव की सोच के साथ काम करेगी।” सुनीता कहती हैं, “मेरे माता-पिता ही मेरी असली प्रेरणा हैं।” उनकी मां सुखदेई देवी, आज 96 वर्ष की उम्र में भी उनका हौसला बढ़ाती हैं। मां हर दिन सुबह 3 बजे उठती थीं ताकि बच्चे समय पर पढ़ाई कर सकें।

Haryana News: सुनीता के संघर्ष का सम्मान, राष्ट्रपति सम्मान पाने वाली हरियाणा की एकमात्र शिक्षिका

गांव से कॉलेज की दूरी 14 किलोमीटर थी, जिसे सुनीता साइकिल से तय करती थीं। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी उच्च शिक्षा का खर्च खुद उठाया। 1996 में बीएड एंट्रेंस परीक्षा में तीसरी टॉपर रहीं। इसके बाद 1996 से 2013 तक निजी संस्थानों में शिक्षिका और प्रिंसिपल के तौर पर कार्य किया। 2014 में उन्हें सरकारी स्कूल में नियुक्ति मिली। सुनीता के पति पवन ढुल और उनके बच्चे भी उनकी प्रेरणा का हिस्सा हैं। बेटा अध्ययन ऑस्ट्रेलिया में कार्यरत है और बेटी वंशिका अशोका यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रही हैं।

सुनीता ढुल न केवल एक कुशल शिक्षिका हैं, बल्कि रेडक्रॉस की राष्ट्रीय मास्टर ट्रेनर भी हैं। उन्होंने अब तक 14,000 से अधिक बच्चों को फर्स्ट एड और जीवन रक्षक कौशल का प्रशिक्षण दिया है। साथ ही वह पिछले डेढ़ वर्ष से बच्चों के साथ मिलकर ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान भी चला रही हैं, जिसके तहत प्रत्येक बच्चा अपनी मां के नाम पर एक पौधा लगाता है।

शिक्षा ही समाज में असली बदलाव की चाबी

सुनीता ढुल कहती हैं कि यह पुरस्कार सिर्फ मेरा नहीं, उन सभी माता-पिता और बेटियों का सम्मान है जो समाज की सोच को चुनौती देकर शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। बेटियों को बोझ नहीं, भविष्य की नींव समझें। शिक्षा ही समाज में असली बदलाव की चाबी है।

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