पंजाब में 38 प्रतिशत हिन्दू और 58 प्रतिशत सिख हैं
सत्य खबर राष्ट्रीय
BJP Election strategy for Punjab : पंजाब चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति में बाद फेरबदल किया है। अब तक हिंदू वोटों के सहारे राजनीति करती रही भाजपा ने अब पंजाब में सिख वोटों को लुभाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।

अब उसका ध्यान मुख्य रूप से हिंदुओं को एकजुट करने पर नहीं है, बल्कि वह खुद को पंजाब की मिली-जुली पहचान के साथ सहज पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है। यह बदलाव नेतृत्व और प्रतीकों, दोनों में दिखता है। कांग्रेस के पूर्व नेता, पहले सुनील जाखड़ और अब केवल सिंह ढिल्लों, राज्य इकाई का नेतृत्व कर रहे हैं। इसने आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं को भी शामिल किया है। पार्टी सोच-समझकर ‘पंजाबियत’ की भाषा अपना रही है। नए दफ्तरों का उद्घाटन सुखमनी साहिब पाठ के साथ किया जाता है। ‘जो बोले सो निहाल’ बोला जाता है। अब बीजेपी के कार्यक्रमों में नियमित रूप से गूंजता है।
इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार पंजाब में आ चुके हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन राज्य के तीन-दिवसीय दौरे पर रहे थे। यह साफ संकेत है कि पंजाब की राजनीति में दशकों तक सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद, बीजेपी अब 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले मुख्य भूमिका में आना चाहती है। बांग्लादेश के सीमावर्ती राज्य पश्चिम बंगाल में मिली जीत से उत्साहित बीजेपी का मानना है कि पंजाब में भी उसके पास मौका है।
1980 के बाद से अपने ज्यादातर इतिहास में, बीजेपी शिरोमणि अकाली दल के साथ दूसरे नंबर की पार्टी बनकर ही खुश थी। बीजेपी विधानसभा की 117 सीटों में से सिर्फ 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। इस गठबंधन को पांच बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल ने नाखून और मांस का रिश्ता बताया था। उग्रवाद के दौर में समाज में आई दरारों के बाद, इस गठबंधन को सांप्रदायिक सद्भाव की गारंटी के तौर पर देखा जाता था। बीजेपी से पहले भी, अकाली दल ने अक्सर चुनावों के बाद सरकार बनाने के लिए बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी, भारतीय जनसंघ के साथ गठबंधन किया था।
पंजाब में 1952 में पहली बार बनी गैर कांग्रेसी सरकार
दोनों पार्टियों ने पहली बार 1952 में राज्य की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाया था। 1967 के चुनावों के बाद पुनर्गठित पंजाब में भी चुनाव के बाद ऐसा ही गठबंधन हुआ, जबकि जनसंघ के संस्थापक नेता यज्ञ दत्त शर्मा ने सिख-बहुमत वाला राज्य बनाने के विरोध में आमरण अनशन किया था। ऐसा लगता है कि आखिरकार राजनीतिक जरूरतें ही वैचारिक मतभेदों पर भारी पड़ीं।
पंजाब का सामाजिक ताना-बाना उसकी फुलकारी जैसा है। कई रंगों का एक मिला-जुला रूप। हिंदू और सिखों के बीच लंबे समय से भाषा, रीति-रिवाज, शादियां और कई परिवारों में खून के रिश्ते भी रहे हैं। क्रिकेटर अभिषेक शर्मा के जीजा सिख हैं और पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह ने एक हिंदू महिला से शादी की है, जबकि पंजाबी सूबा आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक और अकाली दल के पूर्व अध्यक्ष मास्टर तारा सिंह का जन्म एक हिंदू खत्री परिवार में नानक चंद मल्होत्रा के रूप में हुआ था।
2011 की जनगणना के अनुसार सिखों की आबादी लगभग 58% और हिंदुओं की लगभग 38% है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से किसी भी समुदाय ने एकमुश्त वोट नहीं दिया है। यही बात दलितों के मामले में भी लागू होती है, जिनकी आबादी 32% से अधिक है- जो किसी भी राज्य में सबसे अधिक अनुपात है।
पंजाब ने हमेशा उन पार्टियों को पसंद किया है जो केवल धर्म या जाति के आधार पर लोगों को एकजुट करने के बजाय व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाती हैं। यहां तक कि अपने सुनहरे दौर में पंथिक अकाली दल ने भी कई हिंदू उम्मीदवार उतारे थे। बीजेपी ने खुद को नए सिरे से ढाला है। 2024 के लोकसभा चुनाव ने बीजेपी को यह सबक और पक्का कर दिया। गुरदासपुर और आनंदपुर साहिब जैसी सीटों पर लगभग 50% हिंदू वोटर होने के बावजूद, पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। हालांकि, उसने अपना वोट शेयर लगभग दोगुना करके 19% तक पहुंचाया और अकाली दल से आगे निकल गई। तब से, बीजेपी ने खुद को नए सिरे से ढालने की कोशिश की है।
भाजपा ने सिख मतदाताओं को रिझाने के लिए कई पहल की हैं, जैसे गुरु गोबिंद सिंह के बेटों की शहादत के सम्मान में ‘वीर बाल दिवस’ मनाना, गोल्डन टेम्पल के लिए FCRA मंजूरी, अफगानिस्तान से गुरु ग्रंथ साहिब की प्रतियां लाना और सिखों की ऐतिहासिक निशानियों को संरक्षित करना प्रमुख हैं।