सात साल से कम सजा वाले अपराध में पुलिस को लेनी होगी जमानत
हाईकोर्ट ने DGP और मुख्य सचिव को दिया अवमानना का नोटिस, मैजिस्ट्रेट भी निशाने पर

सत्य खबर हरियाणा
Punjab and Haryana High Court : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के नियमों की लगातार हरियाणा में हो रही अनदेखी के प्रति अब सख्त मूड में नजर आ रही है।
मनमानी गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के लगातार उल्लंघन को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने पंजाब और हरियाणा के मुख्य सचिव (सीएस) व डीजीपी को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए? हाईकोर्ट ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि राज्यों द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे आदेश की अवहेलना को स्वीकार करने जैसे प्रतीत होते हैं। अदालत ने साफ किया कि केवल दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर देने से अवमानना खत्म नहीं हो जाती है।
मामला सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले के अनुपालन से जुड़ा है। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि पुलिस अनावश्यक गिरफ्तारी न करे और मजिस्ट्रेट भी यांत्रिक तरीके से हिरासत की अनुमति न दें। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से आईपीसी की धारा 498 ए (वैवाहिक क्रूरता) और सात साल तक की सजा वाले अन्य अपराधों में स्वतः गिरफ्तारी से बचने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बावजूद पंजाब और हरियाणा दोनों ही राज्यों में पुलिस गिरफ्तारियां भी कर रही है और उन्हें तुरंत अदालत में भी पेश कर रही है।
पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के संज्ञान में जब यह मामला आया तो हाईकोर्ट ने इस मामले में पंजाब और हरियाणा के डीजीपी और मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया था जिसके बाद दोनों राज्यों के दोनों अधिकारियों ने कुछ पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ चार्जशीट दायर करने की बात कही थी, लेकिन इसके बावजूद पुलिस के व्यवहार में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसी बात को लेकर अब हाईकोर्ट ने दोनों राज्यों के पुलिस और प्रशासनिक प्रमुखों को नोटिस देकर कहा है कि क्यों न उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई की जाए, अदालत में साफ किया है कि चार्जशीट दायर करना अदालत की अवमानना को खत्म करना नहीं है।
हाईकोर्ट के इस कड़े रूख को देखते हुए आने वाले दिनों में पुलिस के व्यवहार में परिवर्तन की उम्मीद की जा रही है। अदालत ने इस मामले में न्यायिक दंडाधिकारियों को भी कहा है कि वह यांत्रिक रूप से हिरासत के आदेश जारी न करें। असल में जेलों में लगातार बढ़ रही कैदियों की संख्या और छोटे मामलों में बेवजह लोगों को हिरासत में भेजने की परंपरा को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किए थे कि 7 साल से कम की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी और आरोपी को हिरासत में भेजने से बचना चाहिए लेकिन पुलिस और न्यायिक दंडाधिकारियों का व्यवहार लगातार उसी तरह का बना हुआ था, इसके बाद अब अदालत सख्त मूड में नजर आ रही है।
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