नई दिल्ली में आयोजित मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों की राष्ट्रीय परामर्श बैठक में छात्र आंदोलन, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों, जम्मू-कश्मीर और समान नागरिक संहिता सहित कई मुद्दों पर प्रस्ताव पारित किए गए। बैठक में विभिन्न संवैधानिक और कानूनी विषयों पर अपनी मांगें और आपत्तियां दर्ज कराई गईं।
छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई पर चिंता
बैठक में जारी बयान में 20 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में पेपर लीक के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की गई। बयान में दावा किया गया कि इस कार्रवाई में 100 से अधिक लोग घायल हुए और इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 21 के उल्लंघन के रूप में बताया गया। बैठक में स्वतंत्र और समयबद्ध न्यायिक जांच तथा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी महत्वपूर्ण रहेगा।
सामाजिक एकता और शिक्षा सुधार की मांग
बैठक में देशभर में शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार लागू करने की मांग का समर्थन किया गया। साथ ही विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक सद्भाव, एकता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने पर जोर दिया गया। बयान में कहा गया कि साझा राष्ट्रीय पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए सहयोग आवश्यक है।

अल्पसंख्यक संस्थानों और धार्मिक स्थलों का मुद्दा
बैठक में रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के खिलाफ जारी ध्वस्तीकरण आदेश का विरोध किया गया। बयान में इसे अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 30(1) के संदर्भ में चुनौती दी गई तथा आदेश वापस लेने और मामले पर पुनर्विचार की मांग की गई। इसके अलावा मस्जिदों और दरगाहों के कथित चयनात्मक ध्वस्तीकरण और सीलिंग पर भी चिंता व्यक्त की गई। इन मामलों में संबंधित सरकारी एजेंसियों की कानूनी प्रक्रिया और पक्ष भी विचारणीय हैं।
जम्मू-कश्मीर और समान नागरिक संहिता पर प्रस्ताव
बैठक में जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग दोहराई गई। साथ ही समान नागरिक संहिता (UCC) के संबंध में यह कहा गया कि यदि कोई व्यवस्था विभिन्न समुदायों के धार्मिक अधिकारों को प्रभावित करती है, तो उसका संवैधानिक और कानूनी स्तर पर विरोध किया जाएगा। यह बैठक में पारित प्रस्तावों का हिस्सा था।
राजनीतिक दलों से भी की गई अपील
बयान में कहा गया कि मुसलमानों को “बंदी वोट बैंक” की तरह देखे जाने का विरोध किया जाता है। साथ ही राजनीतिक दलों, विशेषकर स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले दलों से अपील की गई कि वे मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें और उनकी चिंताओं पर सक्रिय रुख अपनाएं।