वंदे मातरम, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन की भावनाओं और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा जाता है, एक बार फिर राजनीति के केंद्र में है। उत्तर प्रदेश से केरल तक बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। राष्ट्रगीत को लेकर उठे सवाल अब इतिहास, विचारधारा, वोट बैंक और राष्ट्रवाद की बहस में बदल गए हैं।
राष्ट्रगीत पर फिर आमने-सामने सियासी दल
वंदे मातरम को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद कांग्रेस ने बीजेपी पर राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाया। कांग्रेस का कहना है कि जनता से जुड़े मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए इस विषय को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
बीजेपी ने पलटवार करते हुए कांग्रेस के रुख को वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ दिया है। इस तरह एक राष्ट्रीय गीत का सवाल अब दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक टकराव का प्रतीक बनता दिख रहा है।
कांग्रेस ने 1937 के प्रस्ताव का दिया हवाला
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पार्टी के पुराने रुख का उल्लेख करते हुए 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा पारित प्रस्ताव की बात कही। उनके अनुसार, उस समय जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना आजाद जैसे नेताओं की भूमिका रही थी।
कांग्रेस का तर्क है कि वह ऐतिहासिक निर्णय आज भी उसके रुख का आधार है। पार्टी नेताओं ने बीजेपी के मौजूदा अभियान को “दिखावटी राष्ट्रवाद” करार दिया।
1950 में मिली राष्ट्रीय गीत की पहचान
वंदे मातरम का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा है। 25 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक के दौरान ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए जाने की घोषणा का उल्लेख कांग्रेस ने किया है।

यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज की राजनीतिक बहस में बार-बार सामने आ रही है। सवाल केवल गीत के सम्मान का नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ को समझने का भी है।
केरल से यूपी तक बढ़ा विवाद
केरल में बीजेपी ने स्वतंत्रता दिवस समारोहों में वंदे मातरम को कथित तौर पर शामिल नहीं किए जाने के विरोध में सभी जिला मुख्यालयों पर कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है। पार्टी ने राज्य सरकार पर गीत की अनदेखी का आरोप लगाया।
उत्तर प्रदेश में भी विवाद ने राजनीतिक रंग ले लिया। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उसके रुख को वोट बैंक की राजनीति से जोड़ा। वहीं कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया।
अखिलेश और संजय सिंह ने भी उठाए सवाल
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बीजेपी नेताओं की राष्ट्रगीत को लेकर भूमिका पर सवाल खड़े किए। आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह ने भी बीजेपी और आरएसएस के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इतिहास पर प्रश्न उठाए।
इससे बहस और व्यापक हो गई। अब राजनीतिक दल केवल वंदे मातरम के गायन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और राष्ट्रवाद की परिभाषा पर भी सवाल उठा रहे हैं।
राष्ट्रगीत से आगे की असली बहस
वंदे मातरम भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय भावना से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रतीक है। लेकिन जब ऐसे प्रतीक राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा बनते हैं, तो बहस का स्वरूप बदल जाता है।
देश के सामने चुनौती यह है कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रहे। राष्ट्रगीत को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उसके इतिहास, भावना और सम्मान को समझना जरूरी है। आखिरकार, वंदे मातरम का अर्थ केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि उस भारत की स्मृति भी है जिसने स्वतंत्रता के लिए लंबा संघर्ष किया था।