30 अगस्त 1923 को जन्मे शैलेंद्र ने हिंदी सिनेमा को सिर्फ गीत नहीं दिए, बल्कि आम आदमी के सपनों, दर्द, प्रेम और संघर्ष को आवाज दी। रावलपिंडी से मथुरा और फिर मुंबई तक का उनका सफर संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उनके शब्द आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं।
रावलपिंडी से मथुरा तक का सफर
शंकरदास केसरीलाल यानी शैलेंद्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से बिहार के भोजपुर का रहने वाला था। रोजी-रोटी की तलाश परिवार को रावलपिंडी ले गई, लेकिन आर्थिक संकट ने जल्द ही उन्हें मथुरा आने के लिए मजबूर कर दिया।
मथुरा में शैलेंद्र की पढ़ाई आगे बढ़ी। बचपन से ही उनका झुकाव कविता की ओर था। उनकी रचनाएं उस दौर की साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं।
रेलवे की नौकरी और कविता का जुनून
आर्थिक परिस्थितियों ने उन्हें मुंबई पहुंचा दिया। 1942 में उन्होंने माटुंगा रेलवे स्टेशन के रेलवे कारखाने में हेल्पर की नौकरी शुरू की। मशीनों के शोर के बीच भी कविता उनके भीतर लगातार चलती रही।

उनकी भाषा में बनावट नहीं थी। वह आम बोलचाल के शब्दों में जिंदगी की बड़ी सच्चाइयां कह देते थे। शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
राज कपूर से मुलाकात ने बदली जिंदगी
1948 में एक कवि सम्मेलन में राज कपूर ने शैलेंद्र को कविता सुनाते हुए सुना। वह उनके लेखन से बेहद प्रभावित हुए और फिल्म के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। शैलेंद्र ने तब साफ कहा था कि वह पैसों के लिए अपनी कविता नहीं बेचते।
लेकिन कुछ समय बाद मां की बीमारी के इलाज के लिए उन्हें आर्थिक मदद की जरूरत पड़ी। वह राज कपूर के पास पहुंचे। राज कपूर ने मदद की और बदले में अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का वादा लिया।
यहीं से शैलेंद्र के फिल्मी सफर की शुरुआत हुई।
‘बरसात’ से अमर गीतों तक
1948 की ‘बरसात’ से शैलेंद्र ने फिल्मी गीतकार के तौर पर कदम रखा। इसके बाद ‘आवारा’, ‘गाइड’, ‘तीसरी कसम’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्मों से जुड़े उनके गीतों ने हिंदी सिनेमा के संगीत को नई ऊंचाई दी।
उनके गीतों में प्रेम था तो विरह भी। दर्शन था तो उम्मीद भी। सबसे खास बात यह थी कि उनके शब्दों में आम इंसान दिखाई देता था। उनकी रचनाएं केवल पर्दे के किरदारों की भावनाएं नहीं थीं, बल्कि समाज के साधारण व्यक्ति की आवाज भी थीं।
‘तीसरी कसम’ ने तोड़ा सपना
शैलेंद्र ने 1962 में ‘तीसरी कसम’ के निर्माण में अपना सब कुछ लगा दिया। फिल्म बनने में वर्षों लगे, लेकिन रिलीज के बाद उसे अपेक्षित व्यावसायिक सफलता नहीं मिली।
फिल्म की असफलता ने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से गहरा झटका दिया। वह कर्ज में डूब गए और धीरे-धीरे शराब की लत ने भी उन्हें घेर लिया। जिस व्यक्ति ने दूसरों के दर्द को शब्द दिए थे, वह खुद भीतर से टूटने लगा।
14 दिसंबर 1966 को थम गई आवाज
13 दिसंबर 1966 को उनकी तबीयत बिगड़ी। अस्पताल जाते समय भी वह राज कपूर और उनके लिए लिखे जा रहे गीत को लेकर चिंतित थे। लेकिन अगले दिन, 14 दिसंबर को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
यह तारीख इसलिए भी यादगार है क्योंकि इसी दिन राज कपूर का जन्मदिन था। शैलेंद्र का आखिरी गीत अधूरा रह गया, जिसे बाद में उनके बेटे शैली शैलेंद्र ने पूरा किया।
शैलेंद्र चले गए, लेकिन उनके शब्द नहीं गए। प्रेम हो, अकेलापन हो, जिंदगी का दर्शन हो या संघर्ष—उनके गीत आज भी इंसान के भीतर कहीं चुपचाप उतर जाते हैं। शायद यही किसी सच्चे कलाकार की सबसे बड़ी जीत है कि उसके जाने के दशकों बाद भी उसकी आवाज लोगों की अपनी आवाज लगती रहे।