जगतार सिंह हवारा की पैरोल, बंदी सिंहों की रिहाई और बलवंत सिंह राजोआना जैसे मुद्दे पंजाब की राजनीति में हावी
सत्य खबर राष्ट्रीय
Punjab Politics : पंजाब विधानसभा के चुनाव नजदीक आते ही अब एक बार फिर पंजाब में कट्टरपंथी ताकतों ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। इन ताकतों को राजनीतिक दलों का समर्थन भी मिल रहा है। पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पंथक राजनीति फिर सक्रिय होती दिख रही है। जगतार सिंह हवारा की पैरोल, बंदी सिंहों की रिहाई और बलवंत सिंह राजोआना जैसे मुद्दे इस समय पंजाब की सियासत में चर्चा में हैं।

राजनीतिक दलों के नेता पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे जगतार सिंह हवारा को पैरोल देने की मांग कर रहे हैं। खास बात यह है कि इस मांग को लेकर अलग-अलग दलों के नेताओं के सुर एक जैसे नजर आ रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी हवारा को मानवीय आधार पर पैरोल देने के पक्ष में हैं।
पिछले कुछ समय से इस बात का अंदेशा जताया जा रहा था कि पंजाब में कट्टरपंथी राजनीति का दाय़रा बढ़ रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में ‘वारिस पंजाब दे’ नाम से संगठन चलाने वाले कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह की जीत ने इस पर मुहर लगाई थी। अकेले अमृतपाल ही नहीं, बल्कि सरबजीत सिंह खालसा भी निर्दलीय लोकसभा का चुनाव जीते थे। सरबजीत सिंह खालसा का परिचय यह है कि उसके पिता बेअंत सिंह को इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई थी। पंजाब की 13 में से दो सीटों पर दो कट्टरपंथी लोगों का जीतना सिर्फ संयोग नहीं था। बाद में दोनों ने मिल कर पार्टी बना ली, जिसका नाम रखा अकाली दल (वारिस पंजाब दे)। अब जेल में बंद अमृतपाल सिंह ने अपनी पार्टी के पहले उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है। पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कई महीने दूर हैं और बाकी पार्टियों ने अभी कायदे से चुनाव की तैयारी भी शुरू नहीं की है तब अमृतपाल ने उम्मीदवार घोषित किया है। उसकी पार्टी का पहला उम्मीदवार है सतवंत सिंह। बस्सी पठाना सीट से सतवंत को उम्मीदवार बनाया गया है। सतवंत के पिता केहर सिंह को भी इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई थी। सोचें, क्या यह सिर्फ संयोग है कि इंदिरा गांधी के एक हत्यारे का बेटा सांसद बना तो हत्या के दूसरे दोषी के बेटे को विधानसभा की पहली सीट दी गई है? असल में यह कट्टरपंथी वोट सुरक्षित करने का प्रयास है। बताया जा रहा है कि पंजाब में इस बात को लेकर अंदरखाने बहुत चर्चा थी कि अमृतपाल और सरबजीत जैसे लोग चुनाव जीत गए लेकिन वे भी दूसरी पार्टियों की तरह उन लोगों का ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिनके परिजनों ने खालिस्तान राज्य की लड़ाई में हिस्सा लिया था। कहा जा रहा था कि खालिस्तान आंदोलन और बाद में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार में जान गंवाने वाले लोगों की कोई सुध नहीं ले रहा है। तभी अमृतपाल ने केहर सिंह के बेटे को उम्मीदवार बना कर एक बड़ा दांव चला है। पंजाब में इस बार के चुनाव में कट्टरपंथी समूहों की बड़ी भूमिका होने वाली है।
इस मामले ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि बेअंत सिंह के पोते और बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने भी हवारा की पैरोल को लेकर राज्यपाल की सकारात्मक रिपोर्ट का स्वागत किया है। बिट्टू ने कहा कि उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात की और हवारा की मां की उम्र और खराब स्वास्थ्य को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाने के लिए उनका धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के लिए बेअंत सिंह का बलिदान हमेशा सम्मानित रहेगा, लेकिन एक बुजुर्ग और बीमार मां की खातिर हवारा को पैरोल दी जानी चाहिए।
पंथक राजनीति में नए खिलाड़ियों की एंट्री भी इस बार महत्वपूर्ण है। जेल में बंद खडूर साहिब सांसद अमृतपाल सिंह की अगुवाई वाले अकाली दल वारिस पंजाब दे ने 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपना पहला उम्मीदवार घोषित कर दिया है। पार्टी ने फतेहगढ़ साहिब जिले की बस्सी पठाना विधानसभा सीट से 61 वर्षीय सतवंत सिंह को उम्मीदवार बनाया है। सतवंत सिंह, केहर सिंह के बेटे हैं, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या में भूमिका के लिए फांसी दी गई थी। यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि पंजाब की पंथक राजनीति में लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल का दबदबा रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह राजनीतिक आधार अलग-अलग पार्टियों और गुटों में बंट गया है।
2022 में AAP ने अकाली दल के गढ़ में लगाई थी सेंध
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने उन सीटों पर भी शिरोमणि अकाली दल को बड़ा नुकसान पहुंचाया था, जहां परंपरागत रूप से पंथक वोट का मजबूत आधार माना जाता था। इसके बाद अब अलग-अलग अकाली गुट और नए राजनीतिक संगठन इस वोट बैंक को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि हवारा की पैरोल, बंदी सिंहों की रिहाई, राजोआना की सजा, करतारपुर कॉरिडोर और पंथक पहचान से जुड़े मुद्दे 2027 के चुनाव से पहले फिर चर्चा में आ गए हैं। पंजाब की सियासत में अब सवाल यह है कि क्या पंथक वोट दोबारा किसी एक राजनीतिक ताकत के पीछे एकजुट होगा या इस बार भी अलग-अलग दलों और गुटों के बीच बंटा रहेगा।
पिछले कुछ समय से इस बात का अंदेशा जताया जा रहा था कि पंजाब में कट्टरपंथी राजनीति का दाय़रा बढ़ रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में ‘वारिस पंजाब दे’ नाम से संगठन चलाने वाले कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह की जीत ने इस पर मुहर लगाई थी। अकेले अमृतपाल ही नहीं, बल्कि सरबजीत सिंह खालसा भी निर्दलीय लोकसभा का चुनाव जीते थे।
सरबजीत सिंह खालसा का परिचय यह है कि उसके पिता बेअंत सिंह को इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई थी। पंजाब की 13 में से दो सीटों पर दो कट्टरपंथी लोगों का जीतना सिर्फ संयोग नहीं था। बाद में दोनों ने मिल कर पार्टी बना ली, जिसका नाम रखा अकाली दल (वारिस पंजाब दे)। अब जेल में बंद अमृतपाल सिंह ने अपनी पार्टी के पहले उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है। पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कई महीने दूर हैं और बाकी पार्टियों ने अभी कायदे से चुनाव की तैयारी भी शुरू नहीं की है तब अमृतपाल ने उम्मीदवार घोषित किया है। उसकी पार्टी का पहला उम्मीदवार है सतवंत सिंह। बस्सी पठाना सीट से सतवंत को उम्मीदवार बनाया गया है। सतवंत के पिता केहर सिंह को भी इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा हुई थी।
सोचें, क्या यह सिर्फ संयोग है कि इंदिरा गांधी के एक हत्यारे का बेटा सांसद बना तो हत्या के दूसरे दोषी के बेटे को विधानसभा की पहली सीट दी गई है? असल में यह कट्टरपंथी वोट सुरक्षित करने का प्रयास है। बताया जा रहा है कि पंजाब में इस बात को लेकर अंदरखाने बहुत चर्चा थी कि अमृतपाल और सरबजीत जैसे लोग चुनाव जीत गए लेकिन वे भी दूसरी पार्टियों की तरह उन लोगों का ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिनके परिजनों ने खालिस्तान राज्य की लड़ाई में हिस्सा लिया था। कहा जा रहा था कि खालिस्तान आंदोलन और बाद में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार में जान गंवाने वाले लोगों की कोई सुध नहीं ले रहा है। तभी अमृतपाल ने केहर सिंह के बेटे को उम्मीदवार बना कर एक बड़ा दांव चला है। पंजाब में इस बार के चुनाव में कट्टरपंथी समूहों की बड़ी भूमिका होने वाली है।
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