Haryana: 78वें निरंकारी संत समागम में उमड़ा जनसागर — सतगुरु सुदीक्षा जी ने दिया अद्भुत संदेश

Haryana: सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए आध्यात्मिकता को जीवन में अपनाने से जीवन सहज, सुंदर एवं सफल बन जाता है। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने 78वें निरंकारी संत समागम के तीसरे दिन आज उपस्थित विशाल जनसागर को अपने दिव्य प्रवचनों द्वारा मार्गदर्शन प्रदान करते हुए उपरोक्त भाव व्यक्त किए। इस सन्त समागम में विश्वभर से आए लाखों श्रद्धालु सत्गुरु के पावन दर्शनों से आत्मविभोर हो रहे हैं।
सतगुरु माता जी ने फरमाया कि केवल भौतिकता में आसक्त रहना अथवा आध्यात्मिक उन्नति के लिए घर परिवार की जिम्मेदारियों से किनारा कर लेना ये दोनों ही जीवन के चरम छोर हैं। संतों ने हमेशा अलिप्त भाव से संसार में रहकर परमार्थ के मार्ग को अपनाते हुए संतुलित जीवन जीने की बात कही है। जीवन में यदि हम निराकार परमात्मा की उपस्थिति का अहसास करते हुए हर कार्य करते हैं तो वह कार्य निर्लेप भाव से युक्त सेवा ही हो जाता है, जिससे जीवन के दोनों पहलुओं की पूर्ति हो जाती है।

सतगुरु माता जी ने वसुधैव कुटुंबकम की भावना का जिक्र करते हुए कहा कि संत अपने जीवन में आत्मभाव जागृत करके पूरी मानवता के प्रति प्रेम भाव धारण करते हैं। संत सबको एक नजर से देखते हुए किसी की जाति-पाति, अच्छाई-बुराई, गरीबी-अमीरी अथवा अन्य कोई भी भेदभाव मन में नहीं रखते हैं और जहां भेदभाव नहीं, वहां नफरत भी नहीं रहती रहता है तो केवल प्रेम। सतगुरु माता जी ने अंत में कहा कि प्रेम देना भी है और स्वीकार भी करना है पर वास्तव में प्रेम बांटने के लिए होता है, केवल बटोरने के लिए नहीं। प्रेम वह भाव है जो जितना देते हैं उतना ही मन खुश रहता है।
उसमें वापस पाने की अपेक्षा नहीं रखी जाती। संतों का भाव तो देने का होता है न कि लेने का। ठीक इसी तरह संतुलित भाव को अपनाने से मन में शिकवे की जगह निरंतर शुकराने का भाव उत्पन्न होने लगता है। सतगुरु माता जी के विचारों से पूर्व निरंकारी राजपिता रमित जी ने संत समागम में उपस्थित श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि यदि कोई सांसारिक प्रेम में डूब जाता है तो वह अपने प्रेमी को ईश्वर का दर्जा देता है और आनंदित रहता है, तो अगर किसी के हृदय में सतगुरु और परमात्मा के प्रति इलाही प्रेम हो तो वह भक्ति बनकर आनंदित हो उठता है, नाचने-गाने लगता है। फिर उसे किसी की भी कमियां नजर आनी बंद हो जाती हैं। सारा विश्व ईश्वर का रूप नजर आने लगता है। हर तरफ उसे ईश्वर के ही दर्शन होने लगते हैं अर्थात् प्रेम एक अद्भुत शक्ति है। इसलिए संसार में अगर प्राप्त करने योग्य कुछ है तो यही अटल सच्चाई है, यही अलौकिक प्रेम है।