ताजा समाचार

DGP OP Singh ने मांगी पुलिस कर्मचारियों के लिए जादू की झप्पी डीजीपी ने किया X हैंडल पर अपना इमोशनल पोस्ट

DGP OP Singh ने मांगी पुलिस कर्मचारियों के लिए जादू की झप्पी डीजीपी ने किया X हैंडल पर अपना इमोशनल पोस्ट

Satyakhabarindia

Satya Khabar Panchkula

DGP Haryana ओ.पी. सिंह ने अपने एक्स हैंडल पर जादू की झप्पी के नाम से एक इमोशनल पोस्ट शेयर की है। हमेशा सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले हरियाणा के कार्यवाहक डीजीपी ने अपनी पोस्ट में कहां है कि पुलिस के जवान बदमाशों से खुलेआम दिन रात बिना डरे थके लड़ते हैं। घर अकेले जाते हैं। अकेले रहते हैं इन्हें चाहिए जादू की झप्पी।
हरियाणा के डीजीपी ने यह पोस्ट आज सुबह डाली है। इसे आज दोपहर तक 5511 लोग देख चुके हैं। अपनी इस पोस्ट में डीजीपी ने बहुत सी ऐसी बातों को शेयर किया है जो उन्होंने पहली बार सार्वजनिक की हैं।

बिहार से आने वाले डीजीपी ओ.पी. सिंह ने बिहार की पूर्व सरकारों का जिक्र करते हुए कहा है कि जिस भू और काल खंड से मैं आया हुँ वहाँ सरकारें नदारद थी। भले की तो भूल जाइए। बुरे में भी बुरा से बुरा हो जाने के बाद ही पहुँचती थी। वो भी एक अतिरिक्त समस्या बनकर। इनके गाली-गलौज के शौक और लूट-बेगार के जुनून से बचने के लिए दैवीय कृपा से कम से काम चलने का मतलब ही नहीं होता था। बदमाशों का कुछ बिगड़ता नहीं था। भलों के लिए इज्जत बचानी मुश्किल होती थी।

लोग पूछते हैं ये सवाल

DHBVN का कमाल, उपभोक्ता को दिया 78 करोड़ 92 लाख का बिजली बिल

लोग पूछते हैं कि आईपीएस में आने का ख्याल कब आया? मेरा जवाब होता है – कभी नहीं। स्कूल-कालेज के साल मजे में कटे। परीक्षाएं हाथ दिखाने का अवसर होती थी। हौसला इतना था कि लगता था कि जो एक दो हाथ-पैर का आदमी कर सकता है, मैं भी कर सकता हुँ। किसी ने कह दिया कि सिविल सेवा की परीक्षा दुनियाँ के जटिलतम में से एक है। मैंने कहा कि देखते हैं। टहलते हुए आईपीएस में पहुँच गया। संघर्ष या तो था नहीं या मुझे पता ही नहीं चला।

पहले दिन ही ठान लिया कि समाधान बनूँगा

व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि घर से हज़ारों मील दूर पहुंच गए। अब जब मैं खुद ही सरकार था सो पहले दिन ही ठान लिया कि समाधान बनूँगा। ज़िले और रेंज में रहे तो अपने मातहतों को कहते रहे कि लोगों पर तरस खाओ। हज़ारों साल की ग़ुलामी के बाद पहली बार राहत की साँस ले रहे हैं। क़ानून समझने की कोशिश कर रहे हैं। गलती और बेवक़ूफ़ी के लिए माफ़ करो। बदमाशी और ठगी के लिए तो बेशक रगड़ दो। जो ख़ुद नहीं करते वो सुविधा दूसरे को कहाँ से दें? जो मेरे ऊपर थे उनको कहा कि जिस बात से किसी के फ़ायदे के लिए मेरा या किसी अन्य का नुक़सान ना होता हो बेझिझक फ़रमाएँ। तब का दिन है और आज। चौतीस साल हो गए हैं। मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं आई।

कुछ बड़ा करने की सोच

Nashik Businessman Scandal: नासिक का रविंद्र 100 से ज्यादा महिलाओं का शोषण, 87 अश्लील वीडियो

कुछ बड़ा करने की सोच ने मुझे हमेशा चलाए रखा है। शुरू के दिनों में एक ओहदेदार के बारे में किसी ने बताया कि इन्होंने ‘सर्व शिक्षा अभियान’ नाम की बड़ी स्कीम चलाई है। फौरन दिमाग़ में आया कि मैं भी कुछ ऐसा ही करूँगा। सालों बाद सरकार ने खेल विभाग का जिम्मा दिया। लोग जब मेडल के जश्न में डूबे थे, मैंने बच्चों को खेल में मैदान में लाने की ठानी। दिव्याँग खिलाड़ियों को बराबरी का दर्जा दिलाने की सोची। अनुसूचित जाति के खिलाड़ियों के लिए विशेष प्रोत्साहन को प्राथमिकता बनाया। मुझे किसी ने नहीं रोका। ‘स्पैट स्कालरशिप स्कीम’ में हर साल पंद्रह लाख बच्चे भाग लेते थे। स्टेडियम तीन महीने खचाखच भरा रहता था। दिव्याँग और सामान्य वर्ग के खिलाड़ियों को एक जैसी सुविधाएं मिलने लगी। ‘फ़ेयरप्ले स्टाइपेंड स्कीम’ में वंचित जाति के खिलाड़ियों को हज़ारों रुपैये का मासिक स्टाइपेंड मिलने लगा। ‘प्ले फॉर इंडिया’ स्कीम ने हरियाणा को पूरे देश में खेलों को प्रोत्साहित करने वाला अग्रणी राज्य बना दिया।

चुनौती स्वीकार करने का क्रम

चुनौती स्वीकार करने का क्रम ऐसे ही चलता रहा। सवेरे की दौड़ में मेरे एक कोच ने कहा कि न्यूजीलैंड में एक रनर है जिसके साथ घड़ी मिलाकर बीसियों शहर में पाँच हज़ार लोग दौड़ते हैं। तलवार फिर खींच गई। मैंने कहा कि एक दिन मैं अपने साथ पचास हज़ार को दौड़ाऊँगा। सालों बाद जब पुलिस में लौटा तो एसएचओ को थाने से बाहर निकलने और लोगों से सरोकार रखने के लिए मैंने जिला मैराथन की तरकीब भिड़ाई। उनको कहा कि आप अपने इलाके के पचास ऐसे लोगों से वर्किंग रिलेशन बनाओ जिनके प्रभाव में बीस-तीस लड़के-बच्चे हों। मैं दस दिन के नोटिस में साल में एक बार ज़िला मैराथन कराऊँगा। आपको इन सबको उसमें भाग लेने के लिए प्रेरित करना है। सोच थी कि इसी बहाने वे थाने से बाहर निकलेंगे, गाड़ियों से उतरेंगे, लोगों से बात करेंगे। मेरी मानना है कि जिस थानेदार की पहुँच हज़ार लोगों तक है वो कभी मार नहीं खा सकता। पहले आयोजन में ही पचास हज़ार लोग उत्साह पूर्वक दौड़े।

समाधान है तो दुनियाँ आपकी

AJL मामले में प्रवर्तन निदेशालय हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में देगा चुनौती

समय वर्तमान से भविष्य की ओर बिना रुके चलता रहता है। इसे कोई परवाह नहीं है कि कोई सो रहा है कि जाग रहा है। पहिया घूमता ही रहता है। एक और बात समय-समय में बड़ा फर्क होता है। अच्छा गोली की तरह निकल जाता है, बुरा काटे नहीं कटता। सुविधा के लिए आदमी ने समय को मापना शुरू किया। सेकंड, मिनट, घंटे, दिन, महीने, साल सब इसी के दिमाग़ की उपज है। शुरू के बीस-पचीस साल इस बात के लिए है कि आप अपने को किसी बीमारी का इलाज घोषित करें। जिसको दरकार होगी वो आपको ढूँढ लेगा। उसका काम हो जाएगा। आप बाज़ार में फिट हो जाएँगे। किसी को बताना नहीं पड़ेगा कि आप क्या कर रहे हैं। चीज़ें मांगनी नहीं पड़ेगी, आप ख़रीद पायेंगे। बेरोज़गारी के शोर-शराबे के बीच मेरा अब भी मानना है कि अगर आपके पास किसी समस्या का समाधान है तो दुनियाँ आपकी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button