सुप्रीम कोर्ट का आदेश- राज्यपाल की भूमिका में हस्तक्षेप नहीं, बिलों पर समय सीमा तय करना गलत

सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अहम फैसला सुनाया है जो राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा बिलों को मंजूरी देने के समय सीमा निर्धारण से जुड़ा है। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत राज्यपाल की भूमिका को छीन नहीं सकती। कोर्ट ने कहा कि संविधान में दी गई लचीलापन बनाए रखना जरूरी है, इसलिए समय सीमा लगाना संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। इस फैसले ने राजनीतिक और प्रशासनिक जगत में बड़ा हलचल मचा दी है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने अपने आदेश में केंद्र और राज्य सरकारों के तर्कों को स्वीकार करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास बिल को मंजूरी देने, बिल को वापस करने या राष्ट्रपति के पास भेजने का विकल्प होता है। इसके अलावा कोई विकल्प राज्यपाल के पास नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि राज्यपाल बिलों को अनिश्चित काल तक रोक नहीं सकते, लेकिन समय सीमा तय करना न्यायपालिका का काम नहीं है क्योंकि इससे शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत प्रभावित होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसलों पर केवल बिल कानून बनने के बाद ही न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

तमिलनाडु मामले में दो-न्यायाधीशों के आदेश को असंवैधानिक ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि तमिलनाडु मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा राज्यपाल को बिल मंजूरी देने की समय सीमा देने का आदेश संविधान के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए राज्यपाल की मंजूरी के बिना बिल को वैध कानून नहीं बना सकती। पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह कहकर राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों को अदालत द्वारा छीनना असंवैधानिक बताया। यह फैसला न्यायपालिका की भूमिका और कार्यक्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट करता है।
संविधान की लचीलेपन का महत्व और शक्तियों का पृथक्करण
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समय सीमा लगाना संविधान में दी गई लचीलापन के पूरी तरह विरोध में होगा। ‘डिम्ड असेंस’ यानी मानी गई सहमति का सिद्धांत बताता है कि एक संस्था दूसरे की भूमिका को छीन नहीं सकती। राज्यपाल या राष्ट्रपति के अधिकारों का न्यायपालिका द्वारा अधिग्रहण संविधान के भाव और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है। अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल इस उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने पूर्ववर्ती फैसलों की पुष्टि करते हुए कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए।
न्यायिक समीक्षा केवल कानून बनने के बाद संभव
अदालत ने यह भी कहा कि बिल की न्यायिक समीक्षा केवल तब हो सकती है जब वह कानून बन जाए। राष्ट्रपति की सलाहात्मक भूमिका (अनुच्छेद 143) के तहत उन्हें कोर्ट से सलाह लेने की आवश्यकता है, लेकिन हर बार बिल राष्ट्रपति के पास भेजे जाने पर ऐसा जरूरी नहीं। यह फैसला न्यायपालिका की सीमाओं को स्पष्ट करता है और राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका को सम्मान देता है।