हाईकोर्ट का बड़ा फैसला कोई भी डिवेलपर कोई प्लाट अलॉट करने के बाद उसे एक तरफ रद्द नहीं कर सकता 7 करोड़ का प्लाट मिलेगा 14000 में
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला कोई भी डिवेलपर कोई प्लाट अलॉट करने के बाद उसे एक तरफ रद्द नहीं कर सकता 7 करोड़ का प्लाट मिलेगा 14000 में

High Court decision: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कर दिया है कि जमीन का सौदा एक बार करने के बाद उसके भाव बढ़ने पर उसे रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत के इस फैसले से हरियाणा के फरीदाबाद जिले के एक व्यक्ति को 62 साल बाद न्याय मिला है। हाईकोर्ट के इस फैसले से हजारों उन लोगों को न्याय की उम्मीद बंधी है जो इसी प्रकार के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
दरअसल फरीदाबाद जिले में 5,103 वर्ग फुट की वह जमीन, जिसे 62 साल पहले 14,000 रुपये से भी कम में खरीदा गया था, अब मौजूदा बाजार कीमत करीब 7 करोड़ रुपये होने के बावजूद केवल 25% अतिरिक्त नाममात्र राशि पर सौंपे जाने का आदेश दिया गया है। इस संपत्ति के एकमात्र वारिस सी. के. आनंद की उम्र 80 वर्ष से अधिक है। जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने अपने हालिया आदेश में कहा, ‘जो पक्ष दशकों तक अपने दायित्वों के पालन को टालता रहा हो, वह बाजार कीमतों में बढ़ोतरी को ढाल बनाकर नहीं अपना सकता।’
यह मामला 1963 का है, जब मैसर्ज आरसी सूद एंड कंपनी लिमिटेड ने फरीदाबाद के सूरजकुंड के पास ईरोस गार्डन्स कॉलोनी शुरू की और खरीददार नांकी देवी (आनंद की मां) से अग्रिम राशि ली। कंपनी ने प्लॉट नंबर 26-ए (350 वर्ग गज) और प्लॉट नंबर बी-57 (217 वर्ग गज) क्रमशः 24 और 25 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से बेचने का समझौता किया। नांकी देवी ने लगभग आधी रकम जमा कर दी थी। इसके बाद वैधानिक अड़चनों, प्रशासनिक देरी और पीढ़ियों तक चली कानूनी लड़ाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। 1963 का पंजाब शेड्यूल्ड रोड्स एंड कंट्रोल्ड एरियाज एक्ट और 1975 का हरियाणा डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन ऑफ अर्बन एरियाज एक्ट लागू होने के बाद डेवलपर ने इन्हें कब्जा न देने का कारण बताया।
1980 के दशक के मध्य में, तीसरे पक्ष को प्लॉट बेचे जाने की आशंका पर अलॉटियों ने केवल बिक्री रोकने के लिए अदालत का रुख किया। तब भी हाईकोर्ट ने माना कि अलॉटमेंट वैध हैं और कंपनी उन्हें एकतरफा रद्द नहीं कर सकती। इसके बावजूद कब्जा नहीं मिला।
2002 में मुकदमेबाजी का नया दौर शुरू हुआ
निचली अदालतों ने अलॉटियों के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन डेवलपर हाईकोर्ट पहुंचा और समय-सीमा, 1964 में कथित रद्दीकरण और छह दशक पुराने सौदे को आज के बाजार में लागू करना अनुचित होने जैसे तर्क दिए।
अदालत का फैसला
जस्टिस गुप्ता ने शनिवार को जारी 22 पन्नों के फैसले में इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया, जिससे लंबे समय से चल रहा जमीन से जुड़ा एक कानूनी विवाद आखिरकार 62 साल बाद अपने अंजाम तक पहुंच गया। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने निजी डेवलपर के खिलाफ मूल अलॉटी के अधिकारों को पूरी तरह बरकरार रखा है। यह मामला उन लोगों के लिए भी मिसाल बन गया है, जो वर्षों से अपने हक के लिए अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं।