अपने आप में यूनिक होती है पशमीना की शॉल बकरी के महीन बालों से हाथ से बनाई जाती है पशमीना शॉल कुरुक्षेत्र के गीता जयंती महोत्सव में उपलब्ध है 2 लाख तक की शॉल
अपने आप में यूनिक होती है पशमीना की शॉल बकरी के महीन बालों से हाथ से बनाई जाती है पशमीना शॉल कुरुक्षेत्र के गीता जयंती महोत्सव में उपलब्ध है 2 लाख तक की शॉल

Satya Khabar,Panchkula
पशमीना, नाम सुनते ही पसीना आता है। कितनी ही ठंड हो पशमीना शरीर को गर्मी प्रदान करता है। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2025 में शिल्पकार कश्मीर की वादियों से पशमीना शॉल लेकर पहुंचे हैं जो लोगों को एक झलक में ही आकर्षित करती है।
2 लाख रुपए तक की पशमीना शॉल
कश्मीर से आए हुए शिल्पकार आमीर ने बताया कि वह पिछले कई सालों से अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में आ रहे हैं यहां पर उनकी काफी अच्छी सेल होती है। इस बार वह 200000 रुपए तक की पशमीना शॉल लेकर पहुंचे हैं। पशमीना शॉल की शुरुआत 8000 हजार से शुरू हो जाती है जो लाखों तक पहुंचती है। यहां पर वह 200000 रुपए की शॉल लेकर पहुंचे हैं। लेकिन यहां पर इतनी बड़ी मार्केट नहीं है जो लोग लाखों की शॉल खरीदें लेकिन 15 से 20 हजार रुपए तक की आसानी से सेल हो जाती है। उन्होंने कहा कि पशमीना सल के साथ-साथ सूट साड़ी अलग-अलग कई प्रकार के आइटम लेकर पहुंचे हैं जो सभी यूनिक हैं। उन्होंने बताया कि वह जो भी आइटम तैयार करते हैं सभी हाथ से तैयार की जाती है।
कश्मीर की वादियों में तैयार होती है पशमीना शॉल
पशमीना शॉल केवल उनके कश्मीर में ही तैयार की जाती है यह पशमीना बकरी की बाल से तैयार किया जाता है जो काफी मुलायम होते हैं। यह बकरी सिर्फ कश्मीर में ही पाई जाती हैं जहां पर ज्यादा ठंडा एरिया है। इससे बहुत ही कम मात्रा में बाल प्राप्त होते हैं। इसलिए कश्मीर पशमीना शॉल के लिए मशहूर है क्योंकि यहां पर पाए जाने वाली पशमीना बकरी के बाल से ही यह तैयार की जाती है। इसलिए यह पशमीना शॉल भारत ही नहीं विदेशों में भी काफी लोकप्रिय है।
मुलायम इतनी की अंगूठी से निकल जाती है शॉल
यह दुनिया की सबसे मुलायम शॉल होती है। यह इतनी मुलायम होती है कि यह एक छोटी सी अंगूठी में से भी आसानी से निकल जाती है। पशमीना शॉल बनाने के लिए उनको 2008 में नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है और स्टेट अवार्ड से कई बार वह नवाजे जा चुके हैं। पशमीना शॉल करीब ₹8000 से शुरू हो जाती है। जिसकी कीमत लाखों तक पहुंचती है जिस पर जितना वर्क किया जाता है उतना ही उसका दाम बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि यह हल्के वजन की और मुलायम होती है और गर्म भी बहुत ज्यादा होती है। जो ठंड से बचाने में काफी अच्छी है।
कई पीढ़ियों से बनाते आ रहे पशमीना शॉल
आमिर ने बताया कि यह सिर्फ एक पैसा ही नहीं बल्कि उनके खून में बसी हुई परंपरा है जो उनके बड़े बुजुर्गों के समय से चलती आ रही है। उन्होंने भी अपने पिता से इसको सीखा है और इसी को अपने रोजी-रोटी कमाने का जरिया बनाया है। उन्होंने कहा कि उनके पिता , उनके दादा, परदादा सभी यही काम करते आए हैं।
कई महीने या सालों में तैयार होती है पशमीना शॉल
उन्होंने जब अपने पिता से इसको सीखा था तब काफी समय लगा क्योंकि यह करीब 8 से 10 महीने या फिर साल या इससे भी ज्यादा समय एक शॉल बनाने में लग जाता है। इसके लिए उन्होंने काफी धैर्य रखा और बारीकी से इस काम को समझा और सीखा है। उनके साथ-साथ उनका पूरा परिवार पशमीना शॉल बनाने में महारत हासिल किए हुए हैं। उन्होंने कहा कि उनका पूरा काम हाथों का होता है इसलिए उनको इतना समय लगता है। हाथों से बने हुए काम की बनावट बहुत अच्छी होती है। जो एकदम से लोगों को अपनी और आकर्षित करती है।
विदेशों के कोने-कोने में पहुंच रहे पशमीना शॉल
यह केवल एक रोजगार का जरिया नहीं यह उनकी परंपरा है जो उनके खून में समाई हुई है। उन्होंने कहा कि वह अपनी कश्मीर में तैयार की हुई पशमीना शॉल को भारत के कोने कोने में पहुंच चुके हैं और विदेशों में भी उनकी डिमांड रहती है। वह अपनी इस परंपरा को जीवित रखने के लिए देश के हर कोने में जितने भी क्राफ्ट और शिल्प मेले लगते हैं सभी में जाते हैं और अपनी कश्मीर की वादियों में तैयार की गई दुनिया की सबसे महंगी पशमीना शॉल की प्रदर्शनी लगाते हैं।