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तृणमूल का गढ़ या विपक्ष की चुनौती, सुंदरबन से डायमंड हार्बर तक सियासी संघर्ष, क्या बदल जाएगी बंगाल राजनीति

Satyakhabarindia

पश्चिम बंगाल का दक्षिण 24 परगना जिला अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा चर्चा में रहता है। एक ओर गंगा का विशाल विस्तार और बंगाल की खाड़ी है, तो दूसरी ओर सुंदरबन का घना मैंग्रोव जंगल इस क्षेत्र की पहचान बनाते हैं। लेकिन यही भूगोल यहां के लोगों के लिए चुनौती भी है। हर कुछ वर्षों में आयला और अम्फान जैसे भीषण चक्रवात इस इलाके को तबाह कर चुके हैं। इन आपदाओं के बाद जीवन फिर से पटरी पर आने से पहले ही नई मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। यही वजह है कि यहां चुनाव केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं बल्कि अस्तित्व, पुनर्निर्माण और भरोसे की लड़ाई भी बन जाते हैं।

तृणमूल का मजबूत गढ़ और विपक्ष की सीमित चुनौती

दक्षिण 24 परगना लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस का मजबूत राजनीतिक आधार रहा है। करीब 90 लाख की आबादी और 31 विधानसभा सीटों वाला यह जिला आज लगभग पूरी तरह से तृणमूल के प्रभाव में माना जाता है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 30 सीटों पर जीत हासिल की थी और लगभग 52.3 प्रतिशत वोट अपने नाम किए थे। भाजपा दूसरे स्थान पर रही, लेकिन उसकी पकड़ सीमित ही रही। केवल भांगड़ सीट पर इंडियन सेक्युलर फ्रंट के नौशाद सिद्दीकी ने जीत दर्ज कर इस एकतरफा राजनीतिक तस्वीर में अपवाद पेश किया।

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डायमंड हार्बर मॉडल और बदलता स्थानीय समीकरण

जिले का डायमंड हार्बर क्षेत्र अब राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में यहां ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की चर्चा पूरे राज्य में हो रही है। कोविड काल में राहत वितरण, स्वास्थ्य शिविरों और सामाजिक योजनाओं के जरिए इस मॉडल ने जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है। वहीं भांगड़ में राजनीतिक संघर्ष और तेज हो गया है, जहां तृणमूल और आईएसएफ के बीच सीधा मुकाबला देखा जा रहा है। मुस्लिम आबादी की बड़ी हिस्सेदारी यहां चुनावी नतीजों को निर्णायक बनाती है।

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विकास बनाम असंतोष: चुनावी मुद्दों की नई जंग

सुंदरबन क्षेत्र आज भी पुराने चक्रवातों के घाव से पूरी तरह उबर नहीं पाया है। खारे पानी, कमजोर तटबंध और रोजगार की कमी ने पलायन को बढ़ाया है। दूसरी ओर, शहरी इलाकों में भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले और जूट मिलों के बंद होने जैसे मुद्दे जनता के बीच असंतोष बढ़ा रहे हैं। बेहाला से लेकर टालीगंज तक मतदाता अब विकास, रोजगार और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में दक्षिण 24 परगना का यह चुनावी रणक्षेत्र सिर्फ राजनीतिक दलों की ताकत का नहीं बल्कि जनता की उम्मीदों और भरोसे का भी बड़ा परीक्षण बन गया है।

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