थाईलैंड का झांसा देकर युवाओं को भेज रहे हैं म्यांमार अमेरिकी नागरिकों के साथ साइबर स्कैम का गढ़ है म्यांमार
थाईलैंड का झांसा देकर युवाओं को भेज रहे हैं म्यांमार अमेरिकी नागरिकों के साथ साइबर स्कैम का गढ़ है म्यांमार

Satya Khabar,Panchkula
बड़ी संख्या में युवाओं को विदेश में नौकरी के नाम पर बरगलाकर म्यांमार भेजा जा रहा है। म्यांमार में इन लोगों को 30000 थाई करेंसी के हिसाब से नौकरी पर लगाया जा रहा है। अगर भारतीय करेंसी की बात करें तो 30000 थाई करेंसी भारत में करीब 62000 रुपए बनती है। म्यांमार आर्मी अभी हाल ही में बड़ी संख्या में भारतीय युवाओं को वहां से डिपोर्ट किया है। डिपोर्ट हुए युवाओं से जो बात हुई है अगर उसे मान जाए तो यह साफ हो जाता है कि इन युवाओं को बड़े सपने दिखाकर अपराध की दुनिया में धकेला जा रहा है।
थाईलैंड और पश्चिमी देशों में अंतर
पश्चिमी देशों में जब कोई व्यक्ति जाता है तो उसे जाने के लिए लाखों रुपए देने पड़ते हैं। डंकी रूट से अमेरिका जाने का खर्च करीब 60 लाख रुपए है। इसी प्रकार से अलग-अलग देशों के अलग-अलग खर्च हैं, लेकिन म्यांमार भले ही डंकी रूट से जाना पड़ता हो लेकिन यहां जाने का कोई खर्चा नहीं है। काम पसंद नहीं आने पर वापसी के नाम पर युवाओं से चार से सात लाख रुपए वसूले जाते हैं। उसके बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। कुछ मामलों में युवाओं से थाईलैंड भेजने के लिए भी 50 हजार से दो लाख रुपए वसूले जाने की बात सामने आती है लेकिन अधिकांश मामलों में युवाओं को थाईलैंड फ्री में भेजा जाता है।
थाईलैंड उतरने के बाद क्या
युवाओं ने बताया कि थाईलैंड उतरने के बाद उनसे एजेंट एक सेल्फी थाईलैंड एयरपोर्ट की मांगता है और जब वह अपनी सेल्फी भेज देते हैं तो उसके बाद एक गाड़ी सीधी आती है और वह फोटो का मिलान करके उसे गाड़ी में बैठाकर एक होटल में ले जाती है। यहां उनके रहने और खाने का सारा इंतजाम रहता है।
इसके बाद शुरू होता है म्यांमार का डंकी रूट
एक या दो दिन थाईलैंड के होटल में रुकने के बाद इनका म्यांमार का डंकी रूट शुरू किया जाता है। यह डंकी रूट तब किया जाता है जब 5-7 युवा इकट्ठे हो जाते हैं। गाड़ी से जाने पर 5 से 6 घंटे में वह उसे नदी पर पहुंच जाते हैं जो थाईलैंड और म्यांमार की सीमा पर है। जंगलों के रास्ते में कई बार गाड़ी में दिक्कत आने पर युवाओं को पैदल ही चलने पर मजबूर होना पड़ता है। तब यह रास्ता दो दिन में पूरा होता है। नदी पार करने के बाद वह लोग म्यांमार में पहुंचते हैं।
म्यांमार में काम
हालांकि म्यांमार में कुछ अलग काम भी मिल सकता है लेकिन जिन युवाओं को यहां से ले जाया जाता है उन्हें साइबर स्कैम करने वाली कंपनियों में काम मिलता है। हाल ही में म्यांमार आर्मी द्वारा डिपोर्ट किए गए युवाओं द्वारा पुलिस को दी गई शिकायत में एक कंपनी “के के पार्क” के नाम से चर्चा में आई है। अधिकांश युवा इसी कंपनी में काम करते थे और म्यांमार आर्मी ने इन्हें वहां से डिपोर्ट किया है। युवाओं को कहना है कि इस कंपनी में अमेरिका के लोगों के साथ स्कैम किया जाता है। इंस्टाग्राम के माध्यम से यह स्कैम होता है।
15 दिन की ट्रेनिंग और उसके बाद काम
यहां पहुंचने वाले युवाओं को 15 दिन की ट्रेनिंग दी जाती है और उसके बाद उन्हें काम पर लगा दिया जाता है। युवाओं को कम के बदले प्रतिमाह 30 हजार थाई मुद्रा दी जाती है। भारतीय करेंसी में यह है करीब 62000 हो जाती है। इसी काम में लगी यहां पर कुछ और कंपनियां भी है जिन्हें चाइनेज कंपनी के नाम से जाना जाता है। अगर किसी युवा को काम पसंद नहीं आए तो भी उसे काम करना ही पड़ेगा क्योंकि वतन वापसी के नाम पर मोटी रकम मांगी जाती है और उसके बावजूद भी यह जरूरी नहीं है कि उन्हें यह पैसा लेकर वापस भेज दिया जाएगा। युवाओं का कहना है कि कंपनी बाद में म्यांमार आर्मी से संपर्क करके उन्हें डिपोर्ट करने का काम करती है।
कैसा है वहां का रहन-सहन
युवाओं ने बताया कि म्यांमार में जिस कंपनी में युवाओं को लगाया जाता है वहीं कुछ कमरे युवाओं के रहने के लिए है। यह कमरा कोई बहुत ज्यादा बड़े नहीं है लेकिन इसके बावजूद एक-एक कमरे में 8 से 10 युवाओं को रखा जाता है। कंपनी की ओर से उन्हें कुछ खाने पीने का सामान भी दिया जाता है लेकिन यह पर्याप्त नहीं होता। युवाओं का कहना है कि इसके बावजूद उन्हें अपने पास से खाने का प्रबंध करना पड़ता है।
सभी युवाओं को थाईलैंड के नाम पर उतारा जाता है म्यांमार
भारतीय युवाओं को एजेंट थाईलैंड में नौकरी का आश्वासन देते हैं लेकिन उसके बाद जब वह युवक थाईलैंड पहुंच जाता है तो उसे म्यांमार भेज दिया जाता है। यह एजेंट भी जानते हैं कि म्यांमार में नौकरी के नाम पर कोई भारतीय शायद ही जाए, लेकिन थाईलैंड भेज कर उसे बाद में म्यांमार शिफ्ट कर दिया जाता है और इसके बाद उसकी मजबूरी हो जाती है।
युवा बोले, आगे कुआं पीछे खाई

म्यांमार से डिपोर्ट होकर आए युवाओं का कहना है कि वहां पहुंचने के बाद उनके लिए आगे कुआं पीछे खाई वाली कहावत हो जाती है। घर से निकलकर वह विदेश पहुंच गए हैं लेकिन अब काम नहीं करें तो खाएंगे क्या और काम करेंगे तो कभी न कभी क्रिमिनल की सूची में उनका भी नाम होगा।
परिजन बोले, अपना देश अच्छा
डिपोर्ट होकर आए जींद के एक युवक की मां ने कहा कि ऐसे विदेश से तो अपना देश बेहतर। उसने कहा कि उसका बेटा थाईलैंड गया था लेकिन बाद में उसे म्यांमार भेज दिया गया। वहां करीब 60 हजार रुपए महीने का काम था। वह कहती है कि इस 60 हजार रुपए से अपने 15 हजार रुपए अच्छे हैं।