Judge cash scandal: यशवंत वर्मा मामले में कोर्ट ने लोकसभा समिति के फैसले पर सवाल उठाए

Judge cash scandal: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज न्यायाधीश यशवंत वर्मा द्वारा दायर याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। न्यायाधीश वर्मा एक नकद घोटाले के आरोपों में फंसे हैं और उन्होंने लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति के गठन को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में समान प्रस्ताव पेश किया गया था, इसलिए 1968 के जजों (जांच) अधिनियम के तहत दोनों सदनों की संयुक्त जांच समिति बननी चाहिए थी। इस मामले में न्यायालय बुधवार और गुरुवार को सुनवाई कर चुका है और अभी निर्णय लंबित है।
सुनवाई के दौरान मुख्य बिंदु और बहस
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस बात पर ध्यान दिया कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन (21 जुलाई) न्यायाधीश वर्मा के मामले को लेकर नोटिस दिया गया था। लेकिन 11 अगस्त को राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने उस नोटिस को खारिज कर दिया। इसके बाद 12 अगस्त को लोकसभा के स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरविंद कुमार की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। इस पर सुनवाई करते हुए जज दीपांकर दत्ता और सतिश चंद्र शर्मा ने पूछा कि अगर राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया तो लोकसभा स्पीकर द्वारा समिति गठन में क्या गलत था।
न्यायाधीश वर्मा के पक्ष में वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लुतरा ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 91 के तहत डिप्टी चेयरमैन के अधिकार सीमित हैं। वे केवल सदन की अध्यक्षता कर सकते हैं लेकिन वे पूरे अध्यक्ष के अधिकार नहीं ले सकते हैं। इस बहस में उन्होंने यह भी कहा कि डिप्टी चेयरमैन की भूमिका और फैसलों में अंतर होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा के वकीलों से पूछा सवाल
गुरुवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यशवंत वर्मा के वकीलों से सवाल किया, “अगर लोकसभा ने समिति बना दी है तो इससे आपको कैसे कोई नुकसान हो सकता है? बाद में यह प्रस्ताव दोनों सदनों को ही जाना है। जज को हटाने के लिए दोनों सदनों की सहमति जरूरी होती है।” कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एक सदन द्वारा समिति का गठन prejudicial नहीं है क्योंकि दोनों सदनों की सहमति आवश्यक होती है।
सुनवाई के अंत में, वर्मा के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि लोकसभा की समिति के समक्ष यशवंत वर्मा की उपस्थिति की तारीख बढ़ाई जाए। वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने बताया कि वर्मा को समिति में लिखित जवाब 12 जनवरी तक देना है और 24 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होना है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करते हुए इन तारीखों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हालांकि, जजों ने इसे खारिज करते हुए कहा कि ये तारीखें काफी पहले से निर्धारित हैं और वर्मा को 12 जनवरी तक अपना लिखित जवाब समिति को देना होगा।
आगे की प्रक्रिया और केस की गंभीरता
यह मामला न्यायपालिका के सम्मान और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा होने के कारण देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था में काफी चर्चा में है। लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति के सामने यशवंत वर्मा की उपस्थिति और जवाबदेही महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद जो भी निर्णय आएगा, उससे इस मामले की दिशा तय होगी। फिलहाल न्यायालय का आदेश सुरक्षित है और यशवंत वर्मा को निर्धारित तारीखों पर समिति के समक्ष जवाब देना होगा। यह मामला न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है और इस पर आम जनता की निगाहें टिकी हुई हैं।