सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला क्या अब महिला सैन्य अधिकारियों को मिलेगा पूरा न्याय

देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत कार्यरत महिला सैन्य अधिकारियों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जिन महिला अधिकारियों को गलत मूल्यांकन प्रक्रिया के चलते परमानेंट कमीशन नहीं दिया गया, उन्हें अब पूर्ण पेंशन का अधिकार मिलेगा। यह फैसला सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों सेवाओं पर लागू होगा। अदालत ने साफ किया कि इन अधिकारियों के साथ न्याय होना जरूरी है क्योंकि उनके करियर को गलत नीतियों और मूल्यांकन के कारण नुकसान पहुंचा है।
कोर्ट ने मानी मूल्यांकन प्रक्रिया में खामियां
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अगुवाई वाली बेंच ने अपने फैसले में कहा कि महिला अधिकारियों के एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट यानी एसीआर को कई बार लापरवाही से तैयार किया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह मान लिया गया था कि उन्हें आगे स्थायी कमीशन नहीं मिलेगा। इस सोच ने उनकी मेरिट को प्रभावित किया और उन्हें करियर में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। कोर्ट ने यह भी माना कि 2019 में लागू की गई नीतियां जल्दबाजी में लाई गई थीं जिससे अधिकारियों को उचित अवसर नहीं मिल पाया।

20 साल सेवा मानकर मिलेगी पेंशन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिन महिला अधिकारियों को पहले ही सेवा से हटा दिया गया था, उन्हें भी 20 साल की सेवा पूरी मानकर पेंशन दी जाएगी। यह पेंशन 1 नवंबर 2025 से लागू होगी। कोर्ट ने कहा कि भले ही ये अधिकारी वास्तविक रूप से 20 साल सेवा पूरी नहीं कर सकीं, लेकिन नीतिगत खामियों के कारण उन्हें नुकसान हुआ, इसलिए उन्हें यह लाभ मिलना चाहिए। हालांकि अदालत ने उन्हें दोबारा सेवा में लेने का आदेश नहीं दिया, लेकिन यह भी साफ किया कि सिर्फ ऑपरेशनल कारणों के आधार पर वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
सेना में महिलाओं के अधिकारों पर बड़ा संदेश
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि सेना केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं है और महिलाओं को बराबर अवसर मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि अवसरों की कमी ने महिला अधिकारियों के करियर और योग्यता को प्रभावित किया। साथ ही यह भी कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से इन अधिकारियों को नुकसान हुआ। यह फैसला न केवल प्रभावित महिला अधिकारियों के लिए राहत लेकर आया है बल्कि भविष्य में सैन्य सेवाओं में महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है।