
Satya Khabar, Panchkula
अरावली! आज अरावली का शब्द जुबां पर आते ही सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला याद आता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा। 670 किलोमीटर लंबाई में फैली अरावली की पहाड़ियां हरियाणा के तोशाम से शुरू होती है और यह इसके बाद राजस्थान से होकर गुजरात तक जाती हैं। हरियाणा में अरावली की पहाड़ियों की ऊंचाई अक्सर 300 मीटर (लगभग 1000 फीट) के आसपास होती है, हालांकि कुछ चोटियां इससे अधिक ऊंची हैं, जिनमें नारनौल के पास ढांसी पहाड़ियां शामिल हैं। हरियाणा में इसे कई स्थानीय नामों से भी जाना जाता है और इसे ‘ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ अरावली’ प्रमुख रूप से कहा जाता है।
हरियाणा में अरावली श्रृंखला का सबसे उत्तरी छोर तोशाम हिल्स है, जो भिवानी के पश्चिम में है और स्थानीय रूप से छोटी पहाड़ियों के रूप में जानी जाती है। यहां पर खनन का काम पिछले कई सालों से लगातार चल रहा है। तोशाम में अरावली की पहाड़ियां सबसे नीची हैं। हरियाणा में अरावली की सबसे ऊंची चोटी ढांसी पहाड़ियां हैं, जो महेंद्रगढ़ जिले के सतनाली में स्थित हैं और यह ऋषि च्यवन से जुड़ी हैं। अरावली की पहाड़ियों का सबसे ऊंचा स्थान चोटी गुरु शिखर है जो माउंट आबू में है। यहां पर इनकी ऊंचाई 1,722 मीटर अर्थात 5,650 फीट है।
अगर सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान फैसले की बात करें तो हरियाणा के अरावली का 80% से ज्यादा वानिकी क्षेत्र अरावली के धरे से बाहर हो जाएगा। क्योंकि जो हरियाणा में अरावली की पहाड़ियां है वह भले ही 300 मीटर के आसपास बैठती हों लेकिन करीब 80% पहाड़ियां 100 मीटर से कम के दायरे में आकर खनन के लिए प्रयोग कर ली जाएंगी और इसके बाद अब तक जो अरावली का एक बंधा हुआ समां है, वह टूट जाएगा। हरियाणा में अरावली की पहाड़ियां महेंद्रगढ़ जिले में और कुछ मेवात में बचेंगे बाकी पूरा इलाका अरावली विहीन हो जाएगा।
हरियाणा के पश्चिम में अरावली पर्वतमाला का आधार तोशाम हिल रेंज को माना जाता है। यहां की चट्टानों में क्वार्टजाइट के साथ चियास्टोलाइट शामिल हैं । ऊपरी परतों में क्वार्ट्ज पोर्फिरी रिंग डाइक, फेल्साइट, वेल्डेड टफ और मस्कोवाइट बायोटाइट ग्रेनाइट चट्टानें हैं, जिनमें व्यवसायिक रूप से अनुपयोगी टिन, टंगस्टन और तांबा पाया जाता है। हरियाणा के भिवानी के पश्चिम में स्थित तोशाम हिल रेंज अरावली रेंज का सबसे उत्तरी छोर है। अरावली का उत्तरपूर्वी विस्तार भारत की राजधानी तक भी फैला हुआ है। स्थानीय रूप से इसे रिज के रूप में जाना जाता है और यह तिरछे रूप से दक्षिण दिल्ली (असोला भट्टी वन्यजीव अभयारण्य की पहाड़ियों) तक जाता है, जहां बंधवाड़ी की पहाड़ियों पर, यह हरियाणा अरावली रेंज से मिलता है जिसमें हरियाणा की दक्षिणी सीमा के साथ-साथ विभिन्न अलग-अलग पहाड़ियां और चट्टानी रिज शामिल हैं। हरियाणा में माधोगढ़ पहाड़ी, सतनाली पहाड़ी, नूंह-फिरोजपुर झिरका पहाड़ी श्रृंखला, नूंह से फिरोजपुर झिरका के दक्षिण तक हरियाणा-राजस्थान सीमा के साथ चलती है।
अरावली के पहाड़ ही राजस्थान से चलने वाली धूल भरी हवाओं को काफी हद तक रोकते हैं। यही नहीं भूकंप के हिसाब से दिल्ली सहित पूरा एनसीआर संवेदनशील जोन-चार के दायरे में आता है। अरावली पहाड़ी की वजह से ही भूकंप का असर नहीं होता। ऐसे में अरावली को बचाना जीवन को बचाना है। अरावली की बर्बादी से जीवन संकट में पड़ जाएगा, भूमाफिया एवं खनन माफिया की नजर इलाके के ऊपर है, वन्य जीवों के ऊपर संकट पैदा हो जाएगा।
अरावली पर्वत श्रृखंला दिल्ली से लेकर गुजरात तक है। जानकार बताते हैं कि 1970 के आस-पास तक अरावली पहाड़ी क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित था। शहरीकरण की आंधी ने सबसे अधिक नुकसान अरावली पहाड़ी क्षेत्र को किया। 1980 के बाद इसके ऊपर भूमाफिया व खनन माफिया की नजर पड़नी शुरू हुई। धीरे-धीरे गैर वानिकी कार्य शुरू हुए। 1990 के बाद गैर वानिकी कार्य की ऐसी आंधी चली कि गुरुग्राम एवं फरीदाबाद के इलाके में ही सैकड़ों हाउस बन गए।

धन कुबेरों ने औने-पाैने कीमत पर लोगों से जमीन खरीद ली। धीरे-धीरे खनन कार्य शुरू हो गए। खनन कार्यों ने अरावली का सीना छलनी कर दिया। न केवल हजारों गहरी खाई क्षेत्र में बन गईं बल्कि जहां 20 से 25 मीटर पर ही अधिकतर जगह पानी मिल जाता था, वहां अब भूजल का नाम-ओ-निशान ही नहीं है। अरावली के इलाकों में रहने वाले वन्यजीवों के लिए कृत्रिम तालाब बनाने पड़ रहे हैं। हर साल गर्मी के मौसम में उसमें पानी डालना पड़ता है। गुरुग्राम एवं फरीदाबाद सहित कई इलाकों में खनन के ऊपर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन यह कागजों में ही है।
नूंह जिले के कई इलाकों में धड़ल्ले से खनन किए जा रहे हैं। इन सब स्थितियों से अरावली के ऊपर उतना अधिक संकट नहीं छाया, जितना संकट एक ही झटके में इसकी नई परिभाषा से छा गया है। नई परिभाषा के लागू होते ही भूमाफिया एवं खनन माफिया की लॉटरी लग जाएगी। अंत में कुछ नहीं बचेगा। अरावली इतिहास बनकर रह जाएगी। ऐसे में अरावली को ही नहीं बल्कि जीवन को बचाने के लिए सभी को आगे आना होगा। यदि आज अरावली के संरक्षण के लिए आवाज बुलंद नहीं की गई तो फिर आने वाली पीढ़ियाें का सांस लेना ही मुश्कल हो जाएगा। अरावली पहाड़ी क्षेत्र में सही मायने में हरियाली बची है।
सात जनवरी को होगी मामले में सुनवाई
अरावली की नई परिभाषा के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में डाली गई याचिका पर सात जनवरी को सुनवाई होगी। याचिका पर्यावरणविद् व सेवानिवृत वन संरक्षक डॉ. आरपी बलवान द्वारा डाली गई है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के साथ ही दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा एवं गुजरात सरकार को नोटिस भेजकर अपना पक्ष रखने को कहा है। पर्यावरण प्रेमियों से लेकर आम लोगों की नजर सात जनवरी की सुनवाई पर है। पर्यावरणविदों का कहना है कि वे अरावली को बचाने के लिए अंतिम दम तक संघर्ष करेंगे। इसे बचाने के लिए आम लोगों को आगे आना चाहिए।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की चेतावनी
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने चेतावनी दी है कि अरावली की करीब 10 हजार पहाड़ियों में खनन गतिविधियों से भारी नुकसान हो रहा है और इसे रोका जाना चाहिए। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने भी इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के जरिए रोकने की बात कही थी। हालांकि केंद्र का तर्क है कि राजस्थान में लागू 100 मीटर पहाड़ी सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत केवल 100 मीटर से ऊंची संरचनाओं को ही अरावली माना जाए।
अरावली पर्वत श्रृंखला इतनी महत्वपूर्ण क्यों?
कहा जाता है कि पृथ्वी पर अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है। यह करीब दो अरब साल पुरानी है और भारत में सबसे पुरानी है। यह हिंद-गंगीय मैदानी इलाकों को रेगिस्तानी रेत से बचाने के लिए एक अहम पारिस्थितिकी बैरियर की तरह काम करता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह पर्वत श्रृंखला न होती तो भारत का उत्तरी क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील होना शुरू हो गया होता। हालांकि, इस श्रृंखला के चलते ही थार रेगिस्तान अपने उत्तर की तरफ (हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) तक नहीं फैल पाया।
इतना ही नहीं अरावली थार रेगिस्तान और बाकी क्षेत्र के बीच जलवायु को संतुलित करने में भी अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा पूरे क्षेत्र में जैव विविधता और भूजल के प्रबंधन में भी यह श्रृंखला बेहद अहम हैं। इसके चलते ही दिल्ली से गुजरात का करीब 650 किलोमीटर का क्षेत्र प्राकृतिक तौर पर विभिन्नता बरकरार रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यह रेंज चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों का स्रोत भी है। इसमें बालू के पत्थर, चूना पत्थर, संगरमरमर और ग्रेनाइट का भी भंडार है। इसके अलावा लेड, जिंक, कॉपर, सोना और टंगस्टन जैसे खनिज भी इस पर्वत श्रृंखला में पाए जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या होगा असर
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद नूंह (मेवात) जिले की अरावली पहाड़ियों और आसपास के गांवों पर संकट गहरा गया है। अदालत द्वारा 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली अरावली पहाड़ियों में खनन की अनुमति दिए जाने से नूंह जिले के 40 से अधिक गांवों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। इसके साथ ही हरियाणा और राजस्थान के कुल 6 जिलों के करीब 100 गांव इस निर्णय से प्रभावित हो सकते हैं। नूंह से सटे राजस्थान के तिजारा, खैरथल, किशनगढ़बास, अलवर, जुरहेड़ा, नगर, पहाड़ी, गोपालगढ़ और कामां क्षेत्र के लगभग 60 गांव भी इस फैसले की जद में हैं। खनन की संभावनाओं को लेकर मेवात क्षेत्र में असंतोष का माहौल बना हुआ है। नगीना उपतहसील के सांठावाड़ी, नांगल मुबारिकपुर, झिमरावट, ढाडोली कलां व खुर्द समेत 13 गांव ऐसे हैं, जहां पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है। यदि इन क्षेत्रों में खनन शुरू हुआ तो गांवों के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहरें (मंदिर, मस्जिद, दरगाहें और किले) भी खतरे में पड़ जाएंगी।