UGC Controversy: भाजपा सांसदों की कमेटी में शामिल बेटा, भाई ने किया विरोध

UGC Controversy: राजनीति अक्सर अजीब और चौंकाने वाले रंग दिखाती है। फिलहाल देशभर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर एक बड़ी हलचल मची हुई है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और केंद्र की भाजपा सरकार के कई नेता अपनी ही सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। इस मामले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के ही कई सांसद और नेता इस विवाद में उलझे हुए हैं।
एक ही परिवार के विरोधाभासी रुख ने बढ़ाई राजनीतिक जटिलता
कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेताओं के बीच विरोधाभास साफ नजर आ रहे हैं। खासतौर पर भाजपा के पूर्व कैसरगंज सांसद बृज भूषण शरण सिंह के बेटे करन भूषण सिंह UGC नियमों को मंजूरी देने वाली समिति के सदस्य थे। वहीं, उनके भाई और गोण्डा विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने इन नियमों का विरोध किया है। 26 जनवरी की शाम प्रतीक ने सोशल मीडिया साइट X पर लिखा कि इतिहास के दोहरे मानकों की जांच होनी चाहिए जहां विदेशी आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों के अपराधों को ‘अतीत की बात’ कहकर भुला दिया जाता है, जबकि भारतीय समाज के एक हिस्से को ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में लेबल कर वर्तमान में उसका बदला लिया जाता है।

समाजवादी पार्टी की स्थिति भी अस्पष्ट
UGC नियमों को लेकर केवल भाजपा के अंदर ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी में भी उलझन दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय, जो अब तक इस मामले पर चुप्पी साधे हुए थे, ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कानून समिति नहीं बनाती बल्कि सरकार बनाती है और संसद में बहुमत से पास करती है। वहीं, पार्टी के राज्यसभा सदस्य राम गोपाल यादव ने कहा है कि वे नियमों के समर्थन में हैं, लेकिन पार्टी का स्पष्ट रुख अभी तक सामने नहीं आया है। समिति के सदस्य संभल सांसद जियाउर रहमान ने भी कहा है कि यदि सरकार कोई ऐसा बिल लाती है जो देश के विकास में मददगार हो, तो वे उसका समर्थन करेंगे और यदि कोई ऐसा बिल आए जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हो, तो उसका लोकतांत्रिक विरोध करेंगे।
कांग्रेस और भाजपा दोनों फंसीं इस विवाद में
इस विवाद में कांग्रेस की भी दुविधा साफ नजर आ रही है। पार्टी न तो बिल का खुलकर समर्थन कर पा रही है और न ही विरोध। इसका बड़ा कारण है कि इस समिति के अध्यक्ष मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह हैं। वहीं भाजपा भी इस मुद्दे पर अपने नेताओं के विरोध और चुप्पी के बीच फंसी हुई है। कई वरिष्ठ और नए सांसद जैसे हेमंत जोशी, संबित पात्रा, बंसुरी स्वराज और रवि शंकर प्रसाद समिति के सदस्य हैं, लेकिन उन्होंने अब तक इस मामले पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है।