पाषाण काल में आदिमानव रहता था अरावली की पहाड़ियों में, फरीदाबाद में अरावली की पहाड़ियों में मिले पाषाण काल के निशान

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने दिल्ली से गुजरात तक फैली संपूर्ण अरावली पर्वतमाला के अवैध खनन को रोकने और इसके संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। केन्द्र ने राज्य सरकारों को अरावली में किसी भी प्रकार के नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्देश जारी किए हैं। लेकिन इसके बावजूद अरावली को लेकर लोगों का डर कम होने का नाम नहीं ले रहा है। राजस्थान में सचिन पायलट इस मामले को लेकर आंदोलन चलाए हुए हैं। हरियाणा में भी कांग्रेस ने इस प्रमुख मुद्दा बनाने का मन बनाया है।
केंद्र सरकार के अनुसार यह प्रतिबंध पूरे अरावली भूभाग पर समान रूप से लागू होता है और इसका उद्देश्य पर्वत श्रृंखला की अखंडता को संरक्षित करना है। इन निर्देशों का लक्ष्य गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है। इधर इस मामले में एक बड़ी खबर यह भी है कि यहां पर पाषाण काल के निशान मिले हैं। अरावली की पहाड़ियां आदिमानव के काल से मौजूद हैं।
इसके अलावा, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद को पूरे अरावली क्षेत्र में अतिरिक्त क्षेत्रों/जोनों की पहचान करने का निर्देश दिया है। केंद्र द्वारा पहले से ही खनन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों के अलावा पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भू-भाग स्तर के विचारों के आधार पर इन जगहों पर खनन प्रतिबंधित किये जाने की आवश्यकता है।
केंद्र ने भले ही खनन पर रोक लगा दी हो, दादरी जिले में अरावली की पहाड़ियां आज बड़े संकट से गुजर रही हैं। विकास और रोजगार के नाम पर इन पहाड़ियों को बेरहमी से काटा जा रहा है। पहाड़ की जगह केवल जमीन समतल हीं नहीं हुई, बल्कि उसे जमीन से करीब 300 फीट गहराई तक खोद दिया है कि जमीन के इस जख्म को भरने में न जानें कितने वर्ष लग जाएंगे। कभी हरियाली और प्राकृतिक संतुलन की पहचान रही अरावली अब गहरे गड्ढों में तब्दील होती जा रही है। ऊपर से पहाड़ का नामो-निशान तक मिटता जा रहा है।

खनन विभाग की मानें तो जिले में 2303.73 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली अरावली की पहाड़ियां दादरी व आसपास के क्षेत्र के पर्यावरण की रीढ़ मानी जाती हैं। लेकिन इनमें से लगभग 383.7 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन गतिविधियां चल रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि नए नियमों के चलते दादरी की अधिकतर पहाड़ियां अब संरक्षण की परिधि से बाहर हो सकती हैं।
अरावली को बचाने के लिए अभियान चलाने वाले लोगों को अब अरावली पर्वत श्रृंखला को बचाने की उम्मीद जगी है। फरीदाबाद के कोट गांव की पहाड़ियों में मिले पाषाण कालीन हाथ-पैर और जानवरों की आकृतियां हजारों साल पुराने मानव जीवन की कहानी बयां करती हैं। यह खोज न केवल इतिहास को उजागर करती है, बल्कि अरावली को विरासत और पर्यटन से जोड़ने की नई दिशा भी दिखाती है।
देश की सबसे पुरानी अरावली पर्वत श्रृंखला को बचाने की दिशा में एक अहम खोज सामने आई है। इस खोज से न केवल अरावली की ऐतिहासिक महत्वता बढ़ी है, बल्कि भविष्य में इसे पर्यटन से जोड़ने की संभावनाएं भी मजबूत हुई हैं। पुरातत्व विभाग से जुड़े तेजवीर मावी ने अरावली क्षेत्र में शोध किया। इस दौरान उन्हें ऐसे प्रमाण मिले जो बताते हैं कि हजारों साल पहले भी यहां इंसान रहते थे और पहाड़ियों पर अपनी छाप छोड़ते थे। फरीदाबाद के कोट गांव की पहाड़ियों में बेहद पुराने हाथ और पैर के निशान मिले हैं। इनके साथ, जानवरों की आकृतियां भी उकेरी गई हैं, जो पाषाण काल के जीवन और प्रकृति से जुड़े संबंध को दर्शाती हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार मिले निशान आकार में काफी बड़े हैं। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि उस समय के इंसान आज की तुलना में अधिक ताकतवर रहे होंगे और उनका शारीरिक ढांचा भी अलग प्रकार का रहा होगा। आदि मानव ने पत्थरों पर पशु-पक्षियों और मानव आकृतियों को उकेरा था। यह काम खास किस्म के पत्थर के औजारों से किया गया, जो उनकी सोच, कला और संस्कृति के विकास को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। पाषाण काल में इंसान जंगलों और गुफाओं में रहता था। शिकार और रोजमर्रा के कामों के लिए वह पत्थरों का सहारा लिया करता था। आधुनिक साधनों के बिना भी वे अपनी बातें पत्थरों पर दर्ज कर जाते थे।
अरावली की चट्टानों के नीचे मिली यह धरोहर इतिहास को और गहराई से समझने का अवसर देती है। आने वाले समय में और खोजें संभव हैं, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को संभालने की आवश्यकता को याद दिलाती हैं।