दीपावली के बाद अब छठ पूजा की धूम दिवाली की तरह चार दिन चलती है छठ पूजा
दीपावली के बाद अब छठ पूजा की धूम दिवाली की तरह चार दिन चलती है छठ पूजा

प्रदेश भर में छठ पूजा का कार्यक्रम धूमधाम से मनाया जाएगा। जिस प्रकार दीपावली पांच दिनों का पर्व होता है उसी प्रकार छठ पूजा 4 दिन का पर्व होता है। यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर सप्तमी को सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देने से पूर्ण होता है। छठ के दिन बड़ी पूजा होती है।
हरियाणा में यह पर्व पहले ज्यादा नहीं मनाया जाता था लेकिन पूर्वांचलियों की बढ़ती आबादी के साथ अब यह पर्व प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। विभिन्न नहरों और नदियों पर छठ पूजा के लिए विशेष घाट बनाए गए हैं।
पर्व के महत्व
पर्व के पहले दिन को नहाय खाय होता है। इसमें सभी भक्तजन अपने घर लौकी की सब्जी, चने की दाल और चावल बनाते हैं। जो सेंधा नमक में बनाया जाता है। घर पर पूजा छठ मैया की पूजा करके यह खाना खाया जाता है। दूसरे दिन को खरना होता है। इसमें सभी अपने घर पर दूध के साथ मीठी खीर में गुड़ डालकर बनाते हैं। उपवास रखकर शाम को मीठा खाकर व्रत शुरू हो जाता है जो सप्तमी की सुबह तक रहता है। जिसको सुबह के सूर्य उदय होने के समय खोला जाता है। तीसरे दिन यानि छठ को संध्या अर्घ्य होता है। इसमें नहर पर शाम को सूर्यास्त के समय पानी के बीच में खड़े होकर पूजा की जाती है। जिसमें सभी भक्त डूबते हुए सूर्य को देखकर पूजा करते हैं। चौथे दिन सप्तमी को उषा अर्घ्य होता है। इसमें सुबह 2 बजे से नहर पर छठी मैया की पूजा करने के लिए घाट पर लोगों का आना शुरू हो जाता है। जो सुबह सूर्योदय के समय तक चलती रहती है।
छठ पर्व को लेकर कथाएं
छठ पूजा की परम्परा और उसके महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं।
रामायण काल : एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
महाभारत काल : एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं।
पुराणों से : एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।