भगवान परशुराम का है जींद से गहरा नाता, रामराय गांव है भगवान परशुराम की तपोभूमि
रामराय में ही है महाभारत के युद्ध का दक्षिणी द्वार, भगवान परशुराम ने दी थी युद्ध न करने की सलाह

सत्य खबर हरियाणा
Bhagwan Parshuram : जींद जिले का रामराय गांव भगवान परशुराम की तपोभूमि रही है। जींद जिले का रामराय (रामहृदय) गांव भगवान परशुराम की तपोभूमि और कर्मस्थली के रूप में विख्यात है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम जी ने यहां भीषण तपस्या की थी और यह स्थल महाभारत काल से भी संबंधित माना जाता है, जहां प्राचीन ईंटों के अवशेष मिले हैं।

जींद-हांसी मार्ग पर स्थित रामराय गांव में भगवान परशुराम का प्रसिद्ध मंदिर और रामराय स्थित है। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के वध का बदला लेने के बाद यहां आकर तपस्या की थी। यहां ब्राह्मण संस्कृत महाविद्यालय परिसर में भगवान परशुराम का 108 फीट ऊंचा मंदिर निर्मित है। माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान परशुराम ने अपने भाई राम के नाम पर एक सरोवर (रामहृदय) का निर्माण कराया था, जो प्राचीन मान्यता से जुड़ा है।
भगवान परशुराम की कर्मस्थली व तपोभूमि माने जाने वाली रामराय के ब्राह्मण संस्कृत महाविद्यालय में मंदिर की नींव खोदाई के दौरान जमीन के करीब 10 फीट नीचे प्राचीन ईंटों की दीवार मिली थी। कुछ ईंटों को बाहर निकालने के बाद खोदाई का काम रोक दिया गया था। जमीन के नीचे मिली ईंटों के महाभारतकालीन होने की आशंका जताई गई।
गांव के ब्राह्मण संस्कृत महाविद्यालय परिसर में भगवान परशुराम के 108 फीट ऊंचे मंदिर निर्माण के लिए नींव खोदाई का काम चल रहा है। इस दौरान जमीन के करीब 10 फीट नीचे करीब डेढ़ फुट लंबी व एक फुट चौड़ी पुरानी ईंटों की दीवार मिली। सूचना मिलने के बाद मौके पर पहुंचे महाविद्यालय व मंदिर निर्माण कमेटी के सदस्यों ने ईंटें देखने के बाद कुछ को बाहर निकालकर खोदाई का काम बंद करवा दिया। इससे पहले 1991 में स्कूल खेल मैदान बनाते समय भी इसी प्रकार की ईंटें मिली थी।
क्या है मान्यता
कुरुक्षेत्र की भूमि पर कौरवों व पांडवों के बीच लड़े गए महाभारत के युद्ध का दक्षिणी द्वार रामराय को माना जाता है। मान्यता है कि कौरवों व पांडवों ने युद्ध के लिए इसी द्वार से युद्ध के मैदान में प्रवेश करते समय परशुराम ने कौरवों व पांडवों को युद्ध से बचने की सलाह दी थी। तथा दादा के रोकने के बाद नरसंहार में मारे गए लोगों के मोक्ष के लिए पांच तर्पण तीर्थों की स्थापना की थी, जिनकी गांव में आज भी मौजूदगी बनी हुई है।
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