चूहा पकड़ने वाले समाज से निकलकर बना बिहार का मुख्यमंत्री, जानिए जीतन राम मांझी की अविश्वसनीय यात्रा

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी आज भले ही केंद्र सरकार में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) मंत्री के रूप में कार्यरत हैं लेकिन उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है। 79 वर्ष की उम्र में भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। मांझी का जन्म बिहार की अत्यंत पिछड़ी मूसहर जाति में हुआ। इस समुदाय की हालत इतनी दयनीय थी कि कभी-कभी लोगों को जीवित रहने के लिए चूहों को खाना पड़ता था। ऐसे हालात से निकलकर राजनीति की ऊंचाईयों तक पहुंचना मांझी के साहस और दृढ़ निश्चय की मिसाल है।
कठिन जीवन ने गढ़ा जुझारू व्यक्तित्व
जीवन की कठिनाइयों ने मांझी को मजबूत बनाया। उनका राजनीतिक सफर 1980 में कांग्रेस पार्टी से शुरू हुआ। हालांकि वे कभी किसी एक दल में लंबे समय तक नहीं रहे। उन्होंने जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल और जेडीयू जैसे दलों का हिस्सा रहते हुए कई बार अपनी निष्ठा बदली। 2015 में उन्होंने अपनी पार्टी ‘हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर)’ की स्थापना की। वे हमेशा गरीबों, दलितों और वंचित वर्गों की आवाज बने रहे और राजनीति में सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी।

पहली जीत और उतार-चढ़ाव भरा सफर
जीतन राम मांझी ने पहली बार 1980 में गया जिले की नक्सल प्रभावित फतेहपुर विधानसभा सीट से विधायक बनकर राजनीति में पहचान बनाई। इसके बाद उन्होंने कई बार लोकसभा चुनाव भी लड़े लेकिन 1991, 2014 और 2019 में हार का सामना किया। 1983 से उन्होंने बिहार के कई मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया जिनमें चंद्रशेखर सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार शामिल हैं। वे नीतीश सरकार में अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण मंत्री भी रहे।
मुख्यमंत्री बनने की कहानी
2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को भारी हार का सामना करना पड़ा। उस समय नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर मांझी को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाया। मांझी ने 20 मई 2014 से 20 फरवरी 2015 तक बिहार के 23वें मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। नौ महीने के इस कार्यकाल में उन्होंने विकास की दिशा में कई फैसले लिए। उन्होंने दलितों और पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए योजनाएं शुरू कीं और शिक्षा व रोजगार के क्षेत्र में सुधार किए।
फिर बने NDA के सहयोगी
मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद मांझी ने अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को नई दिशा दी। वे एक समय आरजेडी महागठबंधन में भी शामिल हुए लेकिन 2019 के चुनावों में सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने एनडीए में वापसी की और अब केंद्र में मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। वे कहते हैं कि बिहार और मगध क्षेत्र के लोग आज भी उन्हें उस मुख्यमंत्री के रूप में याद करते हैं जिसने सीमित समय में विकास की गाथा लिखी। मांझी का यह सफर बताता है कि अगर हौसले मजबूत हों तो कोई भी इंसान गरीबी और भेदभाव की दीवारें तोड़कर देश की राजनीति में मिसाल बन सकता है।