राम मंदिर चढ़ावा विवाद में नया मोड़, CBI जांच की मांग पहुंची सुप्रीम कोर्ट

अयोध्या राम मंदिर से जुड़े कथित चढ़ावा गड़बड़ी मामले में एसआईटी रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद अब एफआईआर दर्ज करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए कहा कि बिना एफआईआर के एसआईटी के पास कोई वैधानिक अधिकार नहीं होता और यह प्रक्रिया मामले को ठंडे बस्ते में डालने जैसी प्रतीत होती है। उन्होंने तत्काल एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
SIT रिपोर्ट के बाद क्या हुआ?
उत्तर प्रदेश सरकार ने 7 जून को तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया था, जिसकी अध्यक्षता संभागीय आयुक्त विजय विश्वास पंत कर रहे थे। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। सूत्रों के अनुसार रिपोर्ट में ट्रस्ट के पुनर्गठन और आगे की आपराधिक जांच के लिए एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की गई है।
FIR की मांग क्यों हो रही है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी आर्थिक अनियमितता, गबन या आपराधिक कृत्य की आशंका है तो उसकी विधिवत जांच के लिए एफआईआर दर्ज होना महत्वपूर्ण माना जाता है। एफआईआर के बाद ही पुलिस या अन्य जांच एजेंसी साक्ष्य एकत्र कर आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ा सकती है।

पूर्व पुलिस महानिदेशक R K Vij का कहना है कि धार्मिक ट्रस्ट की संपत्ति या दान राशि के कथित दुरुपयोग जैसे मामलों में आपराधिक जांच के लिए एफआईआर आवश्यक प्रक्रिया है।
कानूनी विशेषज्ञों की क्या राय है?
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता Virag Gupta के अनुसार एफआईआर किसी भी आपराधिक मामले की आधिकारिक शुरुआत होती है। उनका कहना है कि दान राशि सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय है और यदि किसी प्रकार की अनियमितता के आरोप सामने आए हैं तो उनकी प्रक्रियाबद्ध जांच आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय कानून में एसआईटी का अलग से स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन हाई-प्रोफाइल मामलों में जांच को प्रभावी बनाने के लिए इसका गठन किया जाता है। सामान्यतः एफआईआर दर्ज होने के बाद ही एसआईटी जांच का रास्ता अपनाया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला
राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दाखिल की गई है, जिसमें एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी से कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बिना औपचारिक आपराधिक मामला दर्ज किए एसआईटी जांच शुरू करना कई कानूनी सवाल खड़े करता है।