Gita Jayanti : बंगाल के कृष्ण सिंह की कला को देखकर हर कोई हैरान चावल के दानों से बना दी मां दुर्गा की मूर्ति
Gita Jayanti : बंगाल के कृष्ण सिंह की कला को देखकर हर कोई हैरान चावल के दानों से बना दी मां दुर्गा की मूर्ति

Satya Khabar,Kurkshetra
भगवान की मूर्तियां तो आपने कई देखी होंगी लेकिन क्या धान से बनी भगवान की मूर्तियां कभी आपने देखी है, शायद नहीं। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव का आयोजन कुरुक्षेत्र ब्रह्म सरोवर पर किया जा रहा है, जहां पर देश के अलग-अलग राज्यों से जाने-माने शिल्पकार अपनी शिल्प का प्रदर्शन यहां पर कर रहे हैं जो लोगों को खूब आकर्षित कर रही है ऐसे ही एक शिल्पकार कृष्णा सिंह पश्चिम बंगाल से अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में पहुंचे हैं। जो सोलावुड टेराकोटा मूर्तिकला शिल्पकार है और उन्होंने धान के दाने से मां दुर्गा की अद्भुत मूर्ति बनाई है। जो अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
कई पीढ़ियों से बनाते आ रहे मूर्ति
पश्चिम बंगाल से आए हुए शिल्पकार कृष्णा सिंह ने बताया कि ये सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि एक विरासत है, जो पीढ़ियों से कृष्णा सिंह के परिवार में रची-बसी है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के बोलपुर शांति निकेतन क्षेत्र में उनका परिवार रहता है। पिछले कई दशकों से टेराकोटा और धान से बने अनोखे हस्तशिल्प से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उनके परिवार में वे चौथी पीढ़ी के हैं, जो इस कला पर काम कर रहे हैं। उनसे पहले उनके पिता, उनके दादा और पर दादा भी इस कला पर काम करते आ रहे हैं।
बारीकी से किया जाता है धान के दाने से काम, कई दिनों में होती है तैयार
कृष्णा सिंह ने बताया कि दुर्गा पूजा का त्योहार वेस्ट बंगाल में सबसे बड़ा त्यौहार होता है और उसमें मां दुर्गा की विधिवत रूप से पूजा अर्चना की जाती है तो वहीं धान को भी काफी शुभ माना जाता है इसलिए वह कुछ अलग करने के लिए धान के दाने से मूर्ति बनाने का काम करने लगे थे। धान के दाने से बनी हुई सबसे खास और दुर्लभ कृतियों में प्रमुख है धान (ज़ीरी) से बनी माँ दुर्गा की मूर्ति, जिसमें चेहरा टेराकोटा का होता है और पूरा शरीर बारीक धान के कणों से तैयार किया जाता है। यह सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि धैर्य, समर्पण और अपार निपुणता का संगम है। एक मूर्ति पूरी करने में पूरे परिवार को मिलकर 6-7 दिन लग जाते हैं। 20-25 मूर्तियाँ तैयार करनी हों तो पूरा परिवार दिन-रात एक कर देता है। यह तकनीक इतनी नाज़ुक है कि इस तरह की मूर्तियाँ सिर्फ यही परिवार बनाता है। धान जिसे हम रोज खाया करते हैं उसी से देवी का रूप गढ़ना दर्शाता है कि साधारण से साधारण वस्तु में भी कला के द्वारा दिव्यता भरी जा सकती है। देशभर में कला का डंका बजता है।
मूर्तियां लेकर पहुंचे कृष्णा सिंह
उन्होंने बताया कि हर साल गीता जयंती पर उनका परिवार अपनी कला को देश के सामने प्रस्तुत करने आता है। मां दुर्गा, श्रीकृष्ण, गणेश जी की खूबसूरत मूर्तियां खास तरीके से टोकरियों के भीतर बनाई जाती हैं, जिन्हें पश्चिम बंगाल में अत्यंत शुभ माना जाता है। इनकी छोटी-छोटी टेराकोटा मूर्तियां तो दर्शकों का मन अपनी ओर खींच ही लेती हैं, लेकिन इन सबमें सबसे अनोखी और आकर्षण का केंद्र है धान से बनी हुई मूर्तियां। यहां पर आए हुए पर्यटक भी उनकी इस अनोखी और मनभावन कला को खूब पसंद कर रहे हैं और खरीदारी कर रहे हैं। छोटी मूर्ति का दाम जहां 450 रुपए है, वहीं बड़ी मूर्ति का दाम 700 रुपए रखा गया है।
18 सालों से पहुंच रहे अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव
कृष्णा सिंह ने बताया कि वह पिछले 18 सालों से गीता जयंती महोत्सव में अपनी कला की प्रदर्शनी लगाते आ रहे हैं, जहाँ हर बार लोगों से उन्हें अत्यंत अच्छा रिस्पांस मिलता है। इसके अलावा वे अपनी कला लेकर हरियाणा, तमिलनाडु, पंजाब, राजस्थान सहित देश के कई कोनों तक पहुँच चुके हैं। जहाँ भी जाते हैं, लोगों को उनकी मूर्तियों की बारीक नक्काशी और धान के दानों से उकेरी गई दिव्य आकृति चकित कर देती है। इस कला की चमक और सम्मान के पीछे बहुत सा संघर्ष छिपा है।
उन्होंने बताया कि जब किसी बड़े आयोजन के लिए 20-25 मूर्तियाँ तैयार करनी पड़ती हैं, तो पूरा परिवार एक साथ लगकर काम करता है जिसमें वह न कोई छुट्टी लेते है, न आराम करते है । लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी इस कला को सीखना नहीं चाहती। तेज गति से बदलती दुनिया में युवाओं को यह काम कठिन, समय लेने वाला और कम आर्थिक लाभ वाला लगता है। यही कारण है कि कृष्णा सिंह और उनका परिवार कई बार मन ही मन दुखी हो जाता है। उन्हें डर है कि कहीं आने वाले समय में यह अनोखी धरोहर लुप्त न हो जाए।
परंपरागत विरासत को संजोए रखना चाहते हैं
कृष्णा सिंह और उनका परिवार ना सिर्फ मूर्तियां गढ़ रहा है, बल्कि एक संस्कृति, एक पहचान और एक परंपरा को भी ज़िंदा रखे हुए हैं। ये कहानी सिर्फ एक मूर्तिकार की नहीं है, बल्कि उस परिवार की कहानी है, जो मिट्टी और धान में अपनी भावनाएं, तपस्या और विरासत उकेरता है। कृष्णा सिंह की कारीगरी बताती है कि आज के ऑनलाइन और हाईटेक दौर में कला तभी जीवित रह सकती है, जब कलाकार अपने मन और आत्मा को उसमें ढाल देता है, तब कहीं जाकर दुनिया को इस तरह की एक अद्भुत कला देखने को मिलती है।
एक बेमिसाल विरासत

एक विरासत जिसकी दुनिया में मिसाल नहीं भारत में टेराकोटा कला भले ही ख़ूब प्रसिद्ध है, लेकिन धान के दानों से देवी-देवताओं की मूर्ति बनाना एक विलुप्त प्राय विरासत है, जिसे आज सिर्फ चुनिंदा हाथ ही संभाले हुए हैं। उनको इस आर्ट में राज्य स्तरीय पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। कृष्णा सिंह और उनका परिवार न सिर्फ मूर्तियाँ गढ़ रहे हैं, बल्कि एक संस्कृति, एक पहचान और एक परंपरा को भी ज़िंदा रखे हुए हैं। यह कहानी सिर्फ एक मूर्तिकार की नहीं है यह उस परिवार की कहानी है, जो मिट्टी और धान में अपनी भावनाएँ, तपस्या और विरासत उकेरता है। जो दुनिया को यह सिखाता है कि कला तभी जीवित रहती है जब कलाकार अपने मन और आत्मा को उसमें ढाल देते हैं और लोगों के लिए एक अद्भुत कार्यागिरी से मूर्तियां बनाने का काम करते हैं।